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9788126719280
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विज्ञान-गल्प सम्भवतः हिन्दी गद्य का सबसे उपेक्षित कोना है। न सिर्फ़ यह कि इसमें मौलिक रचनाएँ नहीं होतीं, बल्कि अन्यान्य भाषाओं से विज्ञान-कथाओं के अनुवाद भी अकसर नहीं किए जाते। ‘वाइरस’ इस कमी को पूरा करने की दिशा में एक प्रयास है। यह उपन्यास कम्प्यूटरीकृत विश्व के सम्मुख एक भयावह परिकल्पना रखता है, जो ज़रूरी नहीं कि सच हो ही; लेकिन हो भी सकती है। श्रेष्ठ विज्ञान-गल्प का प्रस्थान-बिन्दु यह ‘हो सकने’ की सम्भावना ही होती है जो इतिहास में अनेक बार सच भी साबित हो चुकी है।

‘वाइरस’ की परिकल्पना का आधार कम्प्यूटर-प्रणाली की आम बीमारी वाइरस है लेकिन यह वाइरस आम नहीं है, वह एक साथ पूरे विश्व के कम्प्यूटरों को अपनी गिरफ़्त में लेता है और सभ्यता को पुनः उस युग में लौटने की आशंका खड़ी कर देता है, जब कम्प्यूटर नहीं थे, और तमाम काम मानव-श्रम की धीमी गति से होते थे। इस संकट को सामने देख पूरा विश्व अपने राजनैतिक मतभेद भुलाकर एकजुट होता है, और दुनिया के सात श्रेष्ठ वैज्ञानिक इसके कारणों की तलाश में जुट जाते हैं। और, जो कारण सामने आता है, वह इस उपन्यास की आधारभूत परिकल्पना का सर्वाधिक उत्तेजक और हमारी कल्पना के लिए स्तब्धकारी अंश है।

मराठी विज्ञान-ग़ल्प के प्रतिष्ठित लेखक की इस रचना में वे सभी गुण—यथा, तथ्यात्मकता, तर्कसंगति, कल्पना और मानव-कल्याण—हैं जो एक श्रेष्ठ विज्ञान-कथा में होने चाहिए।

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Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2010
Edition Year 2024, Ed. 1st
Pages 148p
Price ₹250.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 21.5 X 13.5 X 1
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Jayant Vishnu Narlikar

Author: Jayant Vishnu Narlikar

जयंत विष्णु नार्लीकर

 

शिक्षा : बी.एससी. (1957), बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (पिता विष्णु वासुदेव नार्लीकर यहाँ गणित के विभागाध्यक्ष थे), बी.ए. (1960), पीएच.डी. (1963), एम.ए. (1964), कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, लन्दन।

कैम्ब्रिज में वे ‘रैंग्लर’ रहे। पीएच.डी. करते समय उन्हें सुविख्यात वैज्ञानिक फ्रेड हॉयल का मार्गदर्शन मिला, जिन्होंने अपने ‘इंस्ट्टियूट ऑफ़ थिअॅरेटिक एस्ट्रॉनॉमी’ (सैद्धान्तिक  खगोलशास्त्र  संस्थान)  में  नार्लीकर  को संस्थापक सदस्यता का सम्मान दिया। मुम्बई लौटकर ‘टाटा इंस्ट्टियूट ऑफ़ फ़ंडामेंटल रिसर्च’ (टाटा मूलभूत शोध संस्थान) में प्राध्यापक हुए। सन् 1988 में स्थापित ‘इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फ़ॉर एस्ट्रॉनॉमी एंड एस्ट्रोफ़िज़िक्स’ (अन्तरविश्वविद्यालयीन खगोलशास्त्र तथा खगोल-भौतिक केन्द्र), पुणे के संस्थापक-संचालक बने। 1994-97 में ‘इंटरनेशनल एस्ट्रॉनॉमिकल यूनियन’ के कॉस्मोलॉजी कमीशन के अध्यक्ष रहे।

प्रकाशन : सैद्धान्तिकी, भौतिकशास्त्र, खगोल-भौतिकी तथा विश्वरचनाशास्त्र पर कई ग्रन्थ और शोध-निबन्ध। अपने वरिष्ठ मार्गदर्शक के साथ आविष्कृत किया गया उनका ‘हॉयल नार्लीकर सिद्धान्त’ खगोल-भौतिकी के हर ग्रन्थ में उद्धृत। विज्ञान-केन्द्रित कई पुस्तकें।

सम्मान : ‘टाइसन पदक’, ‘एस-सी.डी. उपाधि’ (कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय), ‘शान्तिस्वरूप भटनागर पुरस्कार’, ‘एम.पी. बिड़ला पुरस्कार’, भारतीय साहित्य विज्ञान अकादमी का ‘इन्दिरा पुरस्कार’, यूनेस्को का ‘कलिंग पुरस्कार’, ‘वाइरस’ पर ‘महाराष्ट्र सरकार का पुरस्कार’ तथा 1965 में ‘पद्मभूषण’ उपाधि। 2014 में उनकी आत्मकथा को मराठी भाषा में ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ मिला।

सम्प्रति : अन्तरविश्वविद्यालयीन खगोलशास्त्र तथा खगोल-भौतिक केन्द्र (पुणे) के संचालक।

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