Videshon Ke Mahakavya

Literary Criticism
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Videshon Ke Mahakavya

इस पुस्तक में अंग्रेज़ी लेखिका एच.ए. गुएरकर की ‘द बुक ऑ़फ एपिक’ से चुनकर विभिन्न भाषाओं के महाकाव्यों में से आठ कथाओं का हिन्दी अनुवाद संकलित है।

किसी भी भाषा की रचनात्मक समृद्धि का पता सिर्फ़ इतने से नहीं चलता कि उसमें मौलिक रचनाएँ कितनी हुर्इं। देश-विदेश की अन्यान्य भाषाओं की कृतियों के अनुवाद से भी भाषा-विशेष समृद्ध होती है। अनुवाद से हमारी भाषा की ग्रहणशीलता का प्रमाण भी मिलता है और उसकी अभिव्यक्ति क्षमता की व्यापकता का भी।

इस दृष्टि से हिन्दी के सामर्थ्य को उजागर करने में अनुवादक के रूप में जो महत्त्वपूर्ण भूमिका गोपीकृष्ण गोपेश ने निभाई, वह अविस्मरणीय है। उन्होंने कई भाषाओं की क्लासिक कृतियों का हिन्दी में अनुवाद करके हिन्दी के प्रबुद्ध पाठकों और साहित्यानुरागियों को यह अवसर उपलब्ध कराया कि जिन भाषाओं में उनकी गति नहीं है, उन भाषाओं की भी कालजयी कृतियों का आस्वादन वे कर सके।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 1946
Edition Year 2017
Pages 291p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 2
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Editorial Review

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Gopikrishna Gopesh

Author: Gopikrishna Gopesh

गोपीकृष्ण गोपेश

जीवन के प्रारम्भिक दिनों में गोपेश जी आकाशवाणी इलाहाबाद से जुड़े। फिर यहीं से

आकाशवाणी कोलकाता चले गए, फिर कोलकाता से मास्को। वहाँ रेडियो मास्को में

डेपुटेशन पर रहे। वापस लौटकर आकाशवाणी दिल्ली में कुछ दिन रहे। बाद में इलाहाबाद और

दिल्ली विश्वविद्यालयों में रूसी भाषा का अध्यापन किया। मास्को में रहते हुए गोपेश जी

मास्को विश्वविद्यालय में हिन्दी भी पढाते थे और वहाँ के प्रतिष्ठित प्रगति प्रकाशन से भी

जुड़ गए थे। उन्‍होंने अनुवाद के क्षेत्र में भी कई अविस्मरणीय कार्य किया।

प्रमुख कृतियाँ : ‘किरन’, ‘धूप की लहरें’, ‘सोने की पत्तियाँ’, ‘तुम्हारे लिए’। जार्ज गिसिंग, मिखाइल शोलोखोव, अनातोली कुज़्नेत्सोव, फ़्योदोर दोस्‍तोयेव्‍स्‍की आदि कई लेखकों की महत्‍त्‍वपूर्ण कृतियों का अनुवाद।

निधन : 4 सितम्बर, 1974

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