Ujar Mein Sangrahalaya

Poetry
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Ujar Mein Sangrahalaya

चन्द्रकान्त देवताले की कविताएँ भवानीप्रसाद मिश्र के इस स्वर्णाक्षरों में उत्कीर्ण किए जाने योग्य वक्तव्य का अप्रतिम उदाहरण बनती नज़र आती हैं कि जो अभी की कविता नहीं है वह कभी की कविता नहीं हो पाएगी। चन्द्रकान्त देवताले जिस तरह हमारे समाज, देश और राजनीति ही नहीं, सारे वैश्विक परिदृश्य पर अपलक तथा पैनी निगाह रखे हुए कवि हैं, वह सिर्फ़ एक अद्वितीय जागरूकता ही नहीं, मुक्तिबोध, नागार्जुन और रघुवीर सहाय जैसी मानव–केन्द्रित नैतिकता से युक्त और ग़ैर–बराबरी तथा अन्याय से मुक्त दुनिया बनाने की आस्था और उसे पाने के संघर्ष की ईमानदार तथा साहसिक मिसाल भी है। कवि जानता है कि समय तारीख़ों से नहीं बदला करता हम एक ऐसी ‘सभ्यता’ में हैं जो उजाड़ में उस संग्रहालय की तरह है जिसकी प्रेक्षक–पुस्तिका में दर्ज़ टिप्पणियों से आप कभी यथार्थ को जान नहीं सकते, जहाँ चीज़ों पर वैधानिक चेतावनियाँ लिखकर सारी ज़िम्मेदारियों से मुक्ति पा ली गई है और अन्त में हर अज्ञात व्यक्ति से सावधान रहने की हिदायत देकर आदमी को आदमी के ख़िलाफ़ तैनात कर दिया गया है।

इस कविता का केन्द्रीय शब्द है ‘हिंसा’ जैसी रचना हमें दो टूक आगाह करती है कि चन्द्रकान्त का कवि–कर्म क्या है, कवि कविता से कितना–क्या चाहता है और कविता तथा जीवन में काहे से गुरेज़ नहीं करता। ‘कवियों की छुट्टी’, ‘क्षमाप्रार्थी हों कविगण’, ‘तुका और नामदेव’ तथा ‘कविता पर रहम करो’ काव्य–कला पर कविताएँ नहीं हैं बल्कि चन्द्रकान्त के आत्मालोचन और व्यापक रचनाधर्मिता को लेकर उसकी अदम्य प्रतिबद्धता को अभिव्यक्ति देती हैं। जीवन–भर पढ़ने–पढ़ाने तथा साक्षरता एवं पुस्तकालय आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी का असर उसकी करिश्मे भी दिखा सकती हैं अब किताबें और किताबों की दुकान में जैसी रचनाओं में देखा जा सकता है जो पुस्तकों की मात्र उपस्थिति से हर्षित होनेवाली हिन्दी की शायद पहली अशाले कविताएँ हैं वे पुस्तकें जिन्हें आज़ादी के बाद से उत्तरोत्तर हमारे समाज से ग़ायब करने का राष्ट्रीय षड्यंत्र अब भी जारी है। इसी तरह शिक्षकों को लेकर लिखी गई नोटबुक से (एक) तथा (दो) कविताएँ हिन्दी में कदाचित् अपने ढंग की पहली ही होंगी। ये सब चन्द्रकान्त की कविता के नए आयाम हैं।

इस पर पहले भी ध्यान गया है कि चन्द्रकान्त देवताले ने स्त्रियों को लेकर हिन्दी में शायद सबसे ज़्यादा और सबसे अच्छी कविताएँ लिखी हैं लेकिन यहाँ उनकी कुछ ऐसी रचनाएँ हैं जो माँ और आजी की दुनियाओं और स्मृतियों में जाती हैं, किन्तु वहीं तक सीमित नहीं रहतीं—वहाँ एक कैंसर–पीड़ित ज़िलाबदर औरत है, बलात्कार के बाद तीन टुकड़ों में काटकर फेंकी गई युवती है, और चन्द्रकान्त अचानक एक विलक्षण परिहास–भावना का परिचय देते हुए मध्यवर्गीय ‘बहनजी–आंटीजी’ छाप प्यारी–प्यारी महिलाओं पर औसतपन और बुद्धिमत्ता के बीच, हिदायतें देने और निगरानी रखनेवाली बीवियाँ, कन्या महाविद्यालय की मैडमों से एक प्राचार्य की बातचीत, ‘मैं आपके काम का आदमी नहीं’ और ‘नींबू माँगकर’ जैसी अनूठी कविताएँ भी लिख डालते हैं—कवयित्रियों में सिर्फ़ निर्मला गर्ग ने ऐसा किया है। देवी–वध में चन्द्रकान्त ने दुस्साहसिकता से देवी–प्रतिमाओं को डायनों और बाज़ार में बैठनेवाली औरतों में बदलते देखा है जबकि ‘बाई! दरद ले’ जैसी मार्मिक कविता में मानो कवि स्वयं उन औरतों में शामिल हो गया है जो अपनी एक सहकर्मी श्रमजीवी आसन्नप्रसवा बहन से प्रसूति–पीड़ा उपजाने को कह रही हैं।

समाज की हर करवट, उसकी तमाम क्रूरताओं और विडम्बनाओं को पहचानने वाली चन्द्रकान्त देवताले की यह प्रतिबद्ध कविताएँ दरअसल भारतीय इनसान और भारतीय राष्ट्र के प्रति बहुत गहरे, यदि स्वयं विक्षिप्त नहीं तो विक्षिप्त कर देनेवाले प्रेम से विस्फोटित कविताएँ हैं। दरअसल कबीर से लेकर आज के युवतम उल्लेख्य हिन्दी कवि–कवयित्रियों की सर्जना के केन्द्र में यह समाज और यह देश ही रहा है। यह देश को खोकर प्राप्त की गई नकली आधुनिक या उत्तर–आधुनिक कविता नहीं है, एक सार्थक देश को पाने की कोशिश की तकलीफ़देह सच्ची कविता है। चन्द्रकान्त देवताले जैसे सर्जक अपनी कविताओं के ज़रिए वही काम करते नज़र आते हैं जो 1857–1947 के बीच और उसके बाद भी सारे असली वतनपरस्तों ने किया है।

यदि चन्द्रकान्त देवताले अपनी जन्मतिथि प्रकट न करें तो उनके किसी भी नए या पुराने पाठक को उनकी यह कविताएँ पढ़कर ऐसा लगेगा कि वे अधिकतम किसी चालीस–पैंतालीस की उम्र के सर्जक की रचनाएँ हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि (हमारे कुछ दूसरे कथित वरिष्ठ कवियों की तरह) उनका विकास अवरुद्ध हो गया है या वे अपनी श्लथ रचनात्मकता के एक लम्बे हाँफते हुए पठार पर पहुँच गए हैं, बल्कि यह कि अभी भी उनकी दृष्टि, अनुभूति तथा ऊर्जा में कोई कमी या छीजन आना तो दूर, उलटे उनके तज्रिबों और निगाह का दायरा और विस्तार पाता जा रहा है। कई कवि एक ख़ास आयु तक आते–आते सहिष्णु, समझौतावादी और परलोकोन्मुख हो जाते हैं क्योंकि हमारे यहाँ एक समन्वय एवं आशीर्वाद वाली सिद्ध मुद्रा प्रौढ़ता की पराकाष्ठा मानी गई है लेकिन चन्द्रकान्त के पास यह कहने की हिम्मत है : “मैं जानता हूँ कि मर रहा हूँ/फिर भी मुझे ईश्वर की ज़रूरत नहीं/क्योंकि धरती की गन्ध और समुद्र का नमक/हमेशा मेरे साथ हैं.../जब सीढ़ियाँ चढ़ता हूँ सबके सुख–दु:ख में शामिल/तो जीवन का संग्राम मेरी धड़कनों में झपट्टे मारने लगता है/पत्थरों के इसी संगीत में मुझे/कुछ भविष्यवाणियाँ सुनाई दे रही हैं...

—विष्णु खरे

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2003
Edition Year 2021, Ed. 2nd
Pages 155p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22.5 X 15 X 1.5
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Editorial Review

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Chandrakant Devtale

Author: Chandrakant Devtale

चन्द्रकान्त देवताले

जन्म : 7 नवम्बर 1936; जौलखेड़ा, ज़िला—बैतूल (मध्यप्रदेश) में।

शिक्षा : एम.ए., पीएच.डी.।

कविता-संग्रह : ‘पहचान’ सीरीज़ में प्रकाशित ‘हड्ड‍ि‍यों में छिपा ज्वर’, ‘दीवारों पर ख़ून से’, ‘लकड़बग्घा हँस रहा है’, ‘रोशनी के मैदान की तरफ़’, ‘भूखंड तप रहा है’, ‘आग हर चीज़ में बताई गई थी’, ‘पत्थर की बैंच’, ‘इतनी पत्थर रोशनी’, ‘उसके सपने’ (विष्णु खरे-चन्द्रकान्‍त पाटील द्वारा सम्पादित संचयन), ‘बदला बेहद महँगा सौदा’ (नवसाक्षरों के लिए साम्प्रदायिकता विरोधी कविताएँ); ‘उजाड़ में संग्रहालय’ (कविता-संग्रह); ‘मुक्तिबोध : कविता और जीवन विवेक’ (आलोचना); सं. : ‘दूसरे-दूसरे आकाश’ (यात्रा-संस्मरण), सं. : ‘डबरे पर सूरज का बिम्ब’ (2002, मुक्तिबोध का प्रतिनिधि गद्य)।

समकालीन साहित्य के बारे में अनेक लेख, विचार-पत्र तथा टिप्पणियाँ प्रकाशित। मराठी से अनुवाद : ‘पिसाटी का बुर्ज : दिलीप चित्रे की कविताएँ’ (1987)। अंग्रेज़ी, मलयालम, मराठी से कविताओं के हिन्दी अनुवाद।

कविताओं के अनुवाद प्रायः सभी भारतीय भाषाओं और कई विदेशी भाषाओं में। अंग्रेज़ी, जर्मन, बंगला, उर्दू, कन्नड़ तथा मलयालम के अनुवाद-संकलनों में कविताएँ शामिल। लम्बी कविता ‘भूखंड तप रहा है’ तथा संकलन ‘उसके सपने’ का मराठी में अनुवाद। ‘आवेग’ के अतिरिक्त ‘त्रिज्या’, ‘वयम्’ तथा मराठी पत्रिका ‘नंतर’ से सम्बद्ध रहे। ब्रेख्त की कहानी सुकरात का घाव का नाट्य-रूपान्तरण।

सम्मान एवं सम्बद्धता : सृजनात्मक लेखन के लिए ‘मुक्तिबोध फ़ेलोशिप’ तथा ‘माखनलाल चतुर्वेदी कविता पुरस्कार’ से सम्मानित। वर्ष म.प्र. शासन का ‘शिखर सम्मान’। उड़ीसा की ‘वर्णमाला साहित्य संस्था’ द्वारा ‘सृजन भारती सम्मान’। ‘अखिल भारतीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’, ‘पहल सम्मान’।

‘म.प्र. साहित्य परिषद्’ के उपाध्यक्ष के अतिरिक्त ‘नेशनल बुक ट्रस्ट’, ‘राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन’, ‘केन्द्रीय हिन्दी संस्थान’ आदि के सदस्य। ‘केन्द्रीय साहित्य अकादेमी’ के भी सदस्य रहे।

1987 में भारतीय कवियों के प्रतिनिधि-दल के साथ अन्तरराष्ट्रीय प्रेमिओ लित्तेरारिओ मोंदेल्लो, पालेर्मो (इटली) साहित्य समारोह में शिरकत।

सम्प्रति : अतिथि साहित्यकार, ‘प्रेमचन्द सृजनपीठ’, उज्जैन—456010 (म.प्र.)।

निधन : 14 अगस्‍त, 2017

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