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Sifar Se Shikhar Tak-Hard Cover

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अपने चेहरे पर अवध के देहातों की मासूमियत और होंठों पर हर वक़्त एक मेहमाननवाज मुस्कुराहट लिये, आँखों में हमेशा इन्तज़ार के चिराग़ जलाए, दोस्तों के क़दमों  पर कान लगाए और कविता तथा शायरी को सीने से लगाए हुए शख़्स का नाम है ए.पी. मिश्र।

'सिफ़र से शिखर तक’ एक ऐसे शख़्स की कहानी है जो अपनी तहज़ीबी विरासत, संस्कारों और जद्दोजहद के बल पर अब एक शख़्सियत बन चुका है।

गाँव की धूप-छाँव ने उनके चेहरे की शरीफ़ाना मासूमियत को बरकरार रखा है। ब्यूटीपार्लर कितनी ही तरक़्क़ी क्यों न कर जाए, लेकिन गाँव का अल्हड़पन और सादा-मिज़ाजी उसका मुक़द्दर नहीं बन सकती।

महात्मा-मिज़ाज शायर अंगद जी महाराज की क़ुरबत और सोहबत ने उन्हें उस मासूम बच्चे जैसा बना दिया, जो कभी कुंभ के मेले में खो जाता है और कभी महाकुंभ में मिल जाता है। लेकिन उस बच्चे के हाथ में खिलौने नहीं होते, उसके हाथों में होती है मीर, कबीर, तुलसी और ग़ालिब की अमानत।

अपनी बेपनाह मसरूफ़ियतों के बावजूद ताज़ादम रहना, पराए ग़मों की चादर ओढ़े हुए मुस्कुराते रहना दुश्वार है, लेकिन ‘सिफ़र से शिखर तक’ के शिल्पकार का यही तो हुनर है कि वह जंगली फूलों से शहर को आबाद करना जानता है। अँधेरे से जंग करते हुए उसे कई दहाइयाँ गुज़र गई हैं, लेकिन आज तक न तो उसके हाथों में कँपकँपाहट है और न चेहरे पर थकान। यूँ तो कुछ लोग किताबें लिखते हैं और कुछ ख़ुद किताब होते हैं। उनके जीवन का हर दिन एक वरक़ होता है और हर बरस एक दास्तान।

ऐसे ही लोगों को दुनिया सूफ़ी, सन्त और कलन्दर मान लेती है। ऐसे लोग दूसरों पर अहसान करके भी आँखें नीची रखते हैं। 'सिफ़र से शिखर तक’ एक सन्त-मिज़ाज की जीवनी है, लेकिन इस जीवनी के ढेर सारे पन्नों में ऐसे बहुत से चेहरे शामिल हैं, जो ए.पी. मिश्र को संजीवनी मान लेते हैं। काश, इसी क़तार में कहीं हम भी खड़े दिखाई दे जाएँ—

तेरे अहसान की ईंटें लगी हैं इस इमारत में,

हमारा घर तेरे घर से कभी ऊँचा नहीं होगा।

—मुनव्वर राना

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2014
Edition Year 2014, Ed. 1st
Pages 160p
Price ₹400.00
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1
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A. P. Mishra

Author: A. P. Mishra

.पी. मिश्र (अयोध्या प्रसाद मिश्र)

जन्म-तिथि : 2 जुलाई, 1953; ग्राम—कोचवा (खन्ता), ज़िला—गोंडा, उत्तर प्रदेश।

शिक्षा : मदनमोहन मालवीय इंजीनियरिंग कॉलेज, गोरखपुर से बी.ई.—इलेक्ट्रिकल इंजीनियर और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एल.एल.बी.।

कार्य : पहली तैनाती—मेघालय राज्य विद्युत परिषद शिलांग में सहायक अभियंता के रूप में। 8 सितम्बर, 1976 को उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद में सहायक अभियंता नियुक्त। सेवा के दौरान प्रयाग में आयोजित पाँच बार कुंभ और महाकुंभ में तैनाती। बिजली के कुशल प्रबन्धन के लिए प्रत्येक बार पुरस्कृत और प्रशंसित। नोएडा और ग़ाज़ियाबाद में अधीक्षण अभियंता और मुख्य अभियंता के रूप में तैनाती। कुछ दिनों तक पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम, मेरठ में निदेशक (तकनीकी) के पद पर। मध्यांचल, पूर्वांचल और उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन के प्रबन्ध निदेशक भी रहे हैं।

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