सौन्दर्य, संवेदना और प्रतिरोध के अद्वितीय कवि हैं रामधारी सिंह ‘दिनकर’, और इस बात को उनके आरम्भिक आत्ममंथन युग की रचना ‘रसवन्ती’ में भी लक्षित किया जा सकता है। इस संग्रह में प्रकृति या ऋतुओं का सौन्दर्य हो; स्त्री-पुरुष का प्रेम हो, पीड़ा का आरोह हो; संघर्ष-सरोकारों की छटपटाहट हो, सामाजिक मूल्य-ह्रास या आगत की रहस्यमयता हो—दिनकर एक साधक के रूप में सभी को निम्नतम से उच्चतम स्तर तक बग़ैर किसी दृष्टिबन्ध के साधते दृष्टिगत होते हैं। यह राष्ट्रकवि की उदात्त अन्तश्चेतना ही है कि वे अपनी परम्परा से विलग नहीं होते और कालिदास के जीवन को साक्षात् करते अपने रचना-लोक में उन्हें ‘कविगुरु’ कहते हैं।
उल्लेखनीय है कि ‘गीत-शिशु’, ‘रसवन्ती’, ‘बालिका से वधू’, ‘प्रीति’, ‘दाह की कोयल’, ‘नारी’, ‘अगुरु-धूम’, ‘पुरुष-प्रिया’, ‘पावस-गीत’, ‘कत्तिन का गीत’, ‘कालिदास’, ‘सावन में’, ‘भ्रमरी’, ‘रहस्य’, ‘शेष गान’ आदि रचनाएँ अपनी प्रांजल प्रवाहमयी भाषा, उच्चकोटि के छन्द विधान और सहज भाव-सम्प्रेषण के कारण इस संग्रह के प्राण-तत्त्व की तरह हैं, जो पढ़नेवाले की स्मृति में रच-बस जाती हैं।
वस्तुत: ‘रसवन्ती’ दिनकर के अन्वेषी मन की विशिष्ट और अविस्मरणीय कृति है।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Hard Back, Paper Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 1939 |
| Edition Year | 2024, Ed. 3rd |
| Pages | 111p |
| Price | ₹495.00 |
| Publisher | Lokbharti Prakashan |
| Dimensions | 20.5 X 13.5 X 1.5 |