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Ras Bhang-Paper Back

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9789360863005
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1998 से 2008 तक, अक्षय बहिबाला भाँग की गिरफ़्त में थे–गाँजा पीते, भाँगे खाते और पीते, पुरी के समुद्री तट पर विदेशियों, हिप्पियों, बैकपैकर्स और दूसरे भगोड़ों के साथ व्यसन में कभी भंड तो कभी बेहद अवसाद में! फिर वह उस किनारे से लौटते हैं, जिसके आगे जीवन में कोई राह नहीं थी। वह जीने की कोशिश करते हैं, कभी वेटर बनकर, कभी सेल्समैन तो कभी पुस्तक-विक्रेता के रूप में वापसी की कोशिशें करते हैं। इस असाधारण किताब की शुरुआत वह अपने व्यसन के दौर के टूटे-बिखरे किरचों को जोड़ते हुए करते हैं। वहाँ से ओडिशा के सुदूर कोनों में बैठे लोगों की कहानियों तक पहुँचते हैं, जिनकी ज़िन्दगी भाँग, गाँजा और अफ़ीम के गिर्द घूमती है। इनमें एक सरकारी लाइसेंसशुदा भाँग की दुकान वाला है जो सबसे शुद्ध भाँग देने की गर्वीली घोषणा करता है और ज़ोर देकर कहता है कि भाँग तो लोगों को यीशु बना सकता है। एक अफ़ीम कटर है जिसने अपने बचपने में अफ़ीम के ढेर को सरसों तेल से ढीला कर छोटे टैबलेट बनाना सीखा। एक लड़की भी है, जिसने अफ़ीम चाटकर हैजा को मात दी और फिर आजीवन एडिक्ट रही। गाँजे की खेती करनेवाला भी है, तो आबकारी विभाग के लोगों की कहानी भी जो गाँजे की खेती को नष्ट करने जाते हैं और गुस्साए गाँववाले उनको पीट देते हैं। इन कहानियों के साथ गुँथे हैं—गाँजे और अफ़ीम की ज़ब्ती और नष्ट करने के सरकारी आँकड़े, भाँग के औषधीय उपयोग पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट और भाँग लड्डू और शर्बत बनाने की रेसिपी भी।

भारत के शायद सबसे लोकप्रिय नशों में एक की यादों, क़िस्सों, तथ्यों और आँकड़ों का नशीला, अलहदा और बेहद मनोरंजक सफ़र! 

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Vyalok Pathak
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 200p
Price ₹299.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 20 X 13 X 1
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Akshaya Bahibala

Author: Akshaya Bahibala

अक्षय बहिबाला

अक्षय बहिबाला पुस्तक-विक्रेता, कवि, प्रकाशक और लाइब्रेरी-एक्टिविस्ट हैं। वह वॉकिंग बुकफ़ेयर्स के सह-संस्थापक हैं, जो एक इंडिपेंडेंट बुकस्टोर, पब्लिशिंग हाउस और देश का सबसे लोकप्रिय बुकमोबाइल है। 20 राज्यों में 35 हज़ार किलोमीटर से भी ज़्यादा की यात्रा कर इस बुकमोबाइल ने पढ़ने-लिखने की संस्कृति को बढ़ाया है। अक्षय ने ओड़िया में चार और अंग्रेज़ी में एक किताब ‘Bhang Journeys’ लिखी है। ‘रसभाँग’ इसी का अनुवाद है। जब वह भारत घूम नहीं रहे होते, तब भुवनेश्वर में अपनी साथी शताब्दी, दोस्त मालू और उनकी बिल्लियों के साथ रहते हैं।

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