Ramo Ka Bhatija

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Ramo Ka Bhatija

‘रामो का भतीजा’ को अधिकांश विद्वान दिदेरो की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक रचना मानते हैं। यह दार्शनिक और नीतिशास्त्रीय होने के साथ ही एक सौन्दर्यशास्त्रीय कृति भी है जो अपने समय के तमाम नैतिक-वैधिक-सामाजिक-सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्यों पर, प्रस्तरीकृत रूढ़ियों पर अनूठे कोण और मारक ढंग से सवाल उठाती है, जिरह करती है और बिना फ़ैसला सुनाए दो अवस्थितियों के दोनों पक्षों पर सोचने और सापेक्षत: सही-ग़लत की शिनाख़्त करने के लिए पाठक को तर्क एवं दृष्टि देकर खुला छोड़ देती है। इसीलिए इसे द्वन्द्ववाद की अनुपम कृति भी माना जाता।

‘रामो का भतीजा’ में स्वयं दिदेरो और रामो का भतीजा—दो ही मुख्य पात्र सामने हैं जिनके बीच एक लम्बे संवाद के रूप में रचना अन्त तक की यात्रा पूरी करती है। रामो का भतीजा भी तत्कालीन पेरिस का एक वास्तविक चरित्र है। प्रसिद्ध फ़्रांसीसी संगीत-रचनाकार रामो उसका चाचा है। (भतीजा) रामो एक ग़रीब संगीतकार है जो पेरिस के बोहेमियाई जीवन का एक प्रतिनिधि है—पूरी तरह से अनैतिक, बिना किसी उसूल का, मानवद्वेषी चरित्र, जो घूसखोर, धनलोलुप, प्रतिक्रियावादी पत्रकारों का मित्र है और एक ऐसा परजीवी जो धनी अभिजातों के घरों में घुसने की जुगत भिड़ाने में दक्ष है।

रामो समाज के नैतिक मानदंडों को ख़ारिज करता है। वह उन्हें एक ऐसी ताक़त मानता है जो उसके लिए बेगानी है, उसके ख़िलाफ़ है और इसलिए बुरी है। अपनी कामनाओं-वासनाओं-आवश्यकताओं की पूर्ति—जीवन में बस इसी एक चीज़ को वह मूल्य के तौर पर स्वीकार करता है। लेकिन रचना का कौशल यह है कि अपने अनैतिक व्यवहार और मानवद्वेषी अभिव्यक्तियों के ज़रिए रामो अपने आसपास की दुनिया को बेनकाब करता जाता है। वह समाज के पाखंडों के मुखौटों को नोच देता है और उसके सारतत्त्व को सामने ला देता है।

वह दार्शनिक (जिसका प्रतिनिधित्व संवाद में दिदेरो करता है) के आदर्शों की निर्जीविता और अमूर्तता को भी उजागर करता है। वह स्पष्टत: देख रहा है कि धन समाज की मुख्य शक्ति बनता जा रहा है, लेकिन दूसरी ओर ग़रीबी भी मौजूद है। इस स्थिति में किसी भी तरह की स्वतंत्रता का बोध भ्रामक है। हर व्यक्ति भाँति-भाँति की मुद्राएँ-मुखौटे ओढ़े हुए है और कोई भी अपने प्रति सच्चा और ईमानदार नहीं है।

 

More Information
Language Hindi
Format Hard Back, Paper Back
Publication Year 2002
Edition Year 2002, Ed. 1st
Pages 127p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1
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Editorial Review

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Denis Diberot

Author: Denis Diberot

देनी दिदेरो

जन्म : 5 अक्टूबर, 1713; लांग्रेस (फ़्रांस)।

प्रबोधकालीन दार्शनिकों की शीर्ष-त्रिमूर्ति में वोल्तेयर और रूसो के साथ तीसरा नाम निर्विवाद रूप से दिदेरो का ही आता है। फ़्रांसीसी क्रान्ति के हरावलों को और समूचे फ़्रांसीसी समाज को वोल्तेयर के बाद दिदेरो ने ही सर्वाधिक प्रभावित किया था। वह अपने समय के ही नहीं, बल्कि पूरी अठारहवीं शताब्दी के एक धुरी व्यक्तित्व था।

अपने सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य ‘विश्वकोश’ (Encyclopédie) के पहले के वर्षों में दिदेरो ने ‘दार्शनिक चिन्तन’, ‘संशयात्म की मटरगश्तियाँ’ और ‘अन्धे के बारे में पत्र’ जैसी कृतियों से रूढ़ियों पर प्रहार शुरू कर दिया था और तीन महीने जेल में रहकर इसकी कीमत चुकाई बाहर आकर 1745 के आस-पास। दिदेरो ने विश्व के भौतिक-आत्मिक पक्ष की सभी तरह की जानकारियों को कोशबद्ध करने तथा उनके माध्यम से भौतिकवादी जीवन-दृष्टि और वैज्ञानिक तर्कणा को जन-जन तक पहुँचाने की महत्त्वाकांक्षी और अनूठी परियोजना की शुरुआत की। दालम्बेर, वोल्तेयर, स्यो, शेवालीए द ज़ाकूर, मार्मांतेल आदि उस काल के अधिकांश दार्शनिकों-विचारकों ने शुरू में विश्वकोश के लिए लिखा, पर दिदेरो ने अकेले ही इसका लगभग अस्सी प्रतिशत हिस्सा लिखा। इस मिशन के लिए उसने अपना स्वास्थ्य खपा-गला दिया और सामान्य जीवन की सभी सुख-सुविधाओं को होम कर दिया। 1751 से 1772 के बीच ‘विश्वकोश’ के कुल 28 बृहद् खंड प्रकाशित हुए। इसके प्रकाशन के दौरान प्रतिक्रियावादियों के लगातार हमलों के कारण दिदेरो को ज़बर्दस्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

‘विश्वकोश’ के सम्पादन के दौरान ही समय निकालकर दिदेरो ने ‘गूँगों-बहरों के बारे में पत्र’, ‘प्रकृति-विषयक प्रतिपादन’ (दार्शनिक कृतियाँ), ‘प्राकृतिक सन्तति’, ‘परिवार का पिता’ (नाटक), ‘दि नन’, ‘रामो का भतीजा’, ‘नियतिवादी जाक’ (उपन्यास), ‘रिचर्डसन की प्रशंसा में’ (साहित्यालोचना), ‘दालम्बेर और दिदेरो का संवाद’ और ‘दालम्बेर का सपना’ जैसी अपनी महत्त्वपूर्ण कृतियों की रचना की।

मृत्यु : 31 जुलाई, 1784; पेरिस (फ़्रांस)।

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