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Pratinidhi Shairy : Akbar Allahabadi-Paper Back

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9788171197149
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1851 की जंगे–आज़ादी में हिन्दुस्तानियों की हार के बाद उर्दू अदब में शुरू होनेवाले रेनासाँ में ‘अकबर’ इलाहाबादी का नाम सफ़े–अव्वल के शायरों में गिना जाता है। धर्म पर आधारित इस रेनासाँ की सारी विशेषताएँ ‘अकबर’ के यहाँ पूरी स्पष्टता के साथ देखी जा सकती हैं।

‘अकबर’ के कलाम की एक विशेषता और भी है। उन्होंने अपनी शायरी की शुरुआत संजीदा रवायती शायरी के साथ की थी। वही गुलो–बुलबुल, वही साग़ रो–मीना, वही शीरीं–फ़रहाद, वही शमा और परवाना रवायती शायरी के सारे प्रतीक ‘अकबर’ की शुरुआती शायरी में नज़र आते हैं। लेकिन अकबर इसी रवायत पर क़ायम रहे होते तो तय है कि वे मामूली दर्जे के सैकड़ों शायरों में बस एक होते।

लेकिन ख़ुशनसीबी कि ऐसा नहीं हुआ। जल्द ही अकबर ने अपनी एक अलग राह बना ली और वे हास्य–व्यंग्य के पहले प्रमुख शायर के रूप में जल्वागर हुए। यूँ तो जाफ़र, मीर, सौदा, ग़ालिब और दूसरे शायरों के यहाँ हास्य और व्यंग्य की सुन्दर छटाएँ देखने को मिलती हैं, लेकिन इनमें से किसी को भी बाक़ायदा हास्य–व्यंग्य का शायर नहीं कहा जा सकता। ये ‘अकबर’ थे जिन्होंने उर्दू शायरी में अपनी बात कहने के लिए हास्य–व्यंग्य का सहारा लिया और एक ऐसी नई रवायत की बुनियाद डाली जो आज तक फल–फूल रही है।

विचारधारा के स्तर पर देखें तो पश्चिमी ज्ञान–विज्ञान और पश्चिमी सभ्यता का जितना भारी विरोध ‘अकबर’ के यहाँ दिखाई देता है, उतना किसी और शायर के यहाँ नहीं दिखाई देता। इसी तरह ‘अकबर’ धार्मिक और सामाजिक सुधार के भी विरोधी थे। बदलते हुए हालात में ‘अकबर’ की शिकस्त लाज़मी थी और कहीं हास्य के साथ और कहीं दु:ख के साथ उन्होंने अपनी इस शिकस्त का इज़हार भी किया है। लेकिन इस नकारात्मक पहलू के अन्दर जो सकारात्मक तत्त्व मौजूद हैं, सावधानी के साथ उनकी निशानदेही किए बिना ‘अकबर’ के साथ इंसाफ़ करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Isbn 10 8171197140
Edition Year 2004
Pages 183p
Price ₹60.00
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 18 X 12 X 1
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Akbar Allahabadi

Author: Akbar Allahabadi

‘अकबर’ इलाहाबादी

नाम : सैयद अकबर हुसैन रिज़्वी।

जन्म : 16 नवम्बर, 1846; इलाहाबाद।

शिक्षा और रोज़गार : दोनों साथ-साथ चले। 1866 में मुख़्तारी और फिर हाईकोर्ट में मिस्लख़्वानी। कुछ समय तक नायब-तहसीलदारी। 1872 में वकालत की परीक्षा पास करके 1880 तक वकालत करते रहे। उसके बाद मुंसिफ़, 1888 में जज और 1892 में अदालते-ख़ुफ़िया के जज हुए। सरकार से, आगे चलकर ख़ानबहादुर का खिताब भी मिला। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के फ़ेलो भी रहे। भारतीय रंगमंच पर गांधी के उदय के बाद उनके प्रशंसक रहे, मगर 1921 के असहयोग आन्दोलन को पूरी तरह देख-समझ नहीं सके और न उसका कोई विशेष प्रभाव ग्रहण कर सके।

प्रकाशन : ‘अकबर’ की शायरी का एक दीवान उनके जीवन-काल में ही प्रकाशित हुआ, और फिर इज़ाफ़ों के साथ अनेक बार इसका पुनर्प्रकाशन होता रहा। ‘अकबर’ के कुल्लियात को आख़िरी शक्ल बहुत बाद में जाकर मिली।

निधन : सितम्बर 1921

 

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