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‘पाहीघर’ अवध के एक गाँव, ख़ासकर एक परिवार के इर्द-गिर्द बुनी गई कथा के साथ-साथ सन् 1857 के उस तूफ़ान की इतिहास-कथा भी है जिसके थपेड़ों से अवध का मध्ययुगीन ढाँचा पूरी तरह चरमरा उठा। एक ओर इसमें तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था का विवरण है तो दूसरी ओर अंग्रेज़ों के भारत में पैर जमाने के पीछे के कारणों पर लेखक की वस्तुपरक दृष्टि और पैनी सोच की भी झलक है।

यह उपन्यास तत्कालीन समाज की विसंगतियों और अन्‍तर्द्वन्‍द्व का भी दर्पण है, जिसके कारण कल और आज में कोई तात्त्विक फ़र्क़ नहीं दिखता। साम्‍प्रदायिक और जातीय तनाव पैदा कर राजनीति करनेवाले तब भी थे और आज भी हैं, बस फ़र्क़ यह है कि उनके मुखौटे बदल गए हैं। उस वक़्त यह काम विदेशी करवाते थे और अब यही काम देशी चरित्र करा रहे हैं।

वस्तुतः ‘पाहीघर’ की कथा एक बहुआयामी अनुभव की धरोहर की दस्तावेज़ है, जो अपनी अन्‍तर्धारा के व्यापक फैलाव के चलते किसी स्थान या काल विशेष की परिधि में बँधना अस्वीकार कर जाती है।

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 1994
Edition Year 2024, Ed. 3rd
Pages 334p
Price ₹299.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 18 X 12 X 1.5
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Kamlakant Tripathi

Author: Kamlakant Tripathi

कमलाकान्त त्रिपाठी

जन्म : 25 फरवरी 1950; बसौली, प्रतापगढ़ (उ.प्र.)।

शिक्षा : इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद से राजनीतिशास्त्र में एम.ए., पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से एम.फिल.।

कार्यक्षेत्र : 1972 से 1975 तक राजनीतिशास्त्र विभाग, गोरखपुर विश्वविद्यालय में प्राध्यापन। 1975 से 2012 तक भारतीय राजस्व सेवा में। 2012 में आयकर लोकपाल पद से सेवानिवृत्त।

प्रकाशित कृतियाँ : उपन्यास—‘पाहीघर’, ‘बेदख़ल’ और ‘सरयू से गंगा’। कहानी-संग्रह—‘जानकी बुआ’, ‘अन्तराल’ और ‘मृत्युराग’। प्रबन्‍धन पर शोध पुस्तक—‘Road to Excellence’.

सम्मान : ‘श्रीकान्त वर्मा स्मृति पुरस्कार’ (1991), हिन्दी अकादमी, दिल्ली का ‘साहित्यिक कृति पुरस्कार’ (1991), ‘कथाक्रम सम्मान’ (1998), सांगाती साहित्य अकादमी, बेलगाम (कर्नाटक) का ‘भारतीय भाषा पुरस्कार’ (2003), इफको का ‘हिन्दी सेवी सम्मान’ (2007), ‘श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको साहित्य सम्मान’ (2016)।

 

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