Nirlep Narayan

Fiction : Novel
As low as ₹200.00 Regular Price ₹250.00
You Save 20%
In stock
Only %1 left
SKU
Nirlep Narayan
- +

यह उपन्यास श्रावक उमरावमल ढढ्ढा की जीवनी पर आधारित है।
श्री ढढ्ढा का जीवन सीधा, सादा और सरल था। रायबहादुर सेठ के पौत्र और एक बड़ी हवेली के मालिक होकर भी उन्होंने आमजन का जीवन जिया। पुरखों द्वारा छोड़ी गई करोड़ों की सम्पत्ति अपने भोग-विलास पर ख़र्च नहीं करके दान कर दी। उनके पुरखे अंग्रेज़ों के बैंकर थे। उनका व्यवसाय इन्दौर, हैदराबाद तक फैला था। महारानी अहल्याबाई के राखीबंद भाई उनके पुरखे थे। उन्होंने पुरखों की सम्पत्ति को छुए बिना नौकरी करके अपना जीवन-यापन किया। श्री ढढ्ढा वस्तुत: एक अकिंचन अमीर थे। वे सचमुच ही निर्लेप नारायण थे।

उमरावमल ढढ्ढा मानते थे कि मैं सबसे पहले इनसान हूँ, बाद में हिन्दुस्तानी। उसके बाद जैन। जैन के बाद श्वेताम्बर। स्थानकवासी परम्परा का श्रावक। वे सम्यक् अर्थों में महावीर मार्ग के अनुगामी और अनुरागी थे।

वे हमेशा अपनी बात अनेकान्त की भाषा में कहते थे। अनेकान्त को समझाने का उनका फ़ार्मूला बड़ा सीधा था। वे कहते थे कि 'ही' और ‘भी' में ही अनेकान्त का सिद्धान्त छिपा है। मेरा मत ‘ही’ सच्चा है, यह एकान्तवाद है जबकि अनेकान्त कहता है कि मेरा मत ‘भी’ सच्चा है और आपका मत ‘भी’ सच्चा हो सकता है।

उन्होंने पुरखों के छोड़े करोड़ों रुपयों के धन को छुआ ही नहीं। वकालत, वृत्तिका और व्यवसाय—इन सब में उन्हें वांछित सफलता नहीं मिली। वकालत इसलिए छोड़ दी कि झूठ की रोटी वे नहीं खा सकते थे। वृत्तिका भी गिरते स्वास्थ्य की वजह से लम्बी नहीं चली। व्यवसाय में घाटे पर घाटे लगे। जो कुछ पास में बचा, वह दान-पुण्य में लुटा दिया।

उन्होंने अमीरी को छोड़ ग़रीबी को अपनाया। जब भी कोई ढढ्ढा हवेली की भव्यता को देखता तो उसकी आँखें आश्चर्य से फटी की फटी रह जातीं कि इतनी बड़ी हवेली का स्वामी एक सीधी-सादी ज़िन्दगी जी रहा है।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2017
Edition Year 2017, Ed. 1st
Pages 132p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Write Your Own Review
You're reviewing:Nirlep Narayan
Your Rating

Editorial Review

It is a long established fact that a reader will be distracted by the readable content of a page when looking at its layout. The point of using Lorem Ipsum is that it has a more-or-less normal distribution of letters, as opposed to using 'Content here

Rajendra Ratnesh

Author: Rajendra Ratnesh

डॉ. राजेन्द्र रत्नेश

सुपरिचित कथाकार और वरिष्ठ पत्रकार डॉ. राजेन्द्र रत्नेश साहित्य, संस्कृति, अध्यात्म और राजनीति पर लिखनेवाले क़लमकारों की उस पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं जो परम्परा और प्रगतिशीलता दोनों के बीच ‘संघर्ष’ नहीं देखते हैं। रत्नेश बहुभाषाविद् होने के साथ प्राचीन और अर्वाचीन साहित्य के अध्येता हैं। उन्होंने भाषायी पत्रकारिता में ‘अक्षरयात्रा’ के लेखन की शुरुआत कर आम पाठक को शब्द और उसके अर्थ के रस-रहस्यों का परिचय दे जो यश अर्जित किया है, उसके लिए हिन्दी पत्रकारिता में उनका अनूठा योगदान है।

इन दिनों डॉ. रत्नेश प्राकृत भारती अकादमी, जयपुर और केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय की एक महत्त्वाकांक्षी शोध परियोजना ‘अंग्विज्जा : अध्ययन एवं अनुवाद’ में व्यस्त हैं। वे ‘राजस्थान पत्रिका’, ‘माया’ और ‘मनोरमा’ के सम्पादन-दायित्व भी निभा चुके हैं।

प्रकाशित कृतियाँ : ‘वर्धमान’, ‘दया की देवी’, ‘गोशालक’, ‘निर्लेप नारायण’ (उपन्यास)।

Read More
Books by this Author

Back to Top