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Nanga-Hard Cover

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9788171196883
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अपने पहले कथा-संकलन ‘कामरेड का कोट’ से ही चर्चित कथाकार सृंजय ने स्पष्ट कर दिया था कि वे ‘महाजनों’ की पिटी-पिटाई लीक पर नहीं चलेंगे, कि उनकी प्रतिबद्धता ‘जन’ के साथ होगी, जन के सिवा किसी अन्य के साथ नहीं। इस प्रतिज्ञा को और भी पुख़्ता करता है उनका यह दूसरा कथा-संकलन—‘नंगा’।

दृश्य, अदृश्य कितनी ही बेड़िया और कितने-कितने दबाव हैं इस ‘जन’ पर, इनके बीच उसकी आकांक्षाएँ हैं, सपने हैं, दुर्निवार संकल्प हैं, जीवट है, जिजीविषा है, साथ ही क़दम-क़दम पर स्खलन और भटकाव भी। अतीत की धुँधली परछाइयों से लेकर अनागत की आहटों तक फैले सृंजय के कथा-संसार में एक और लोककथाओं का परम्परा-प्रवाह है तो दूसरी ओर लोक-शत्रुओं को पहचानने की अधुनातन दृष्टि भी। इस तरह राष्ट्रीय से लेकर अन्तरराष्ट्रीय साज़िशों को नंगा करती हैं ‘नंगा’ की कहानियाँ।

एकरसता से दूर सृंजय की इन कहानियों का रचना-संसार अलग-अलग बुनावटों और बनावटों, अलग-अलग मिज़ाज और तेवरों से लैस है। इस तरह इनके व्यापक फलक में अगर सामन्तवाद का पूँजीवाद के आगे आत्मसमर्पण कराती ֹ‘मूँछ’ है, तो विश्व बाज़ार के नवऔपनिवेशिक जाल में गुड़प होता स्वदेशी ‘बुद्धिभोजी’ भी, असमान विकास को एक्सपोज करती ‘खल्ली छुलाई’ है, तो धर्म के पाखंड को एक्सपोज करती ‘हममज़हब’ भी...स्वप्नों और आग्रहों की स्वनिर्मित ग़ुलामी की शिनाख़्त करती ‘बैल’ और तमाम अशुभ छायाओं के दंश के बीच आदमी की आदमियत को बचाए रखने की कोशिश के रूप में ‘डमर’ भी...साथ ही सत्ता-समीकरण के प्रलोभन और दबाव के अन्तर्गत जनप्रतिबद्धता के अपचय की प्रक्रिया को दर्शाती अतीत के मिथक के माध्यम से अपने समय को व्यंजित करती ‘राजमार्ग पर’ भी।

इन कहानियों की एक विरल विशेषता यह है कि इनकी व्यंजना ऊपर से कम, मगर अन्दर गहरे, बहुत गहरे उतरती जाती है और अपने परिवृत्त में कितने ही प्रत्ययों को समेटती चलती है। कलात्मकता की सर्वथा नूतन बानगी प्रस्तुत करती ये कहानियाँ एक बार पुन: बलपूर्वक प्रमाणित करती हैं कि कला का आरोपण ऊपर से नहीं होता, बल्कि जीवन में गहरे धँसकर ही उसका अवगाहन होता है।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Isbn 10 8171196888
Publication Year 2001
Edition Year 2001, Ed. 1st
Pages 152p
Price ₹150.00
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22.5 X 14.5 X 1
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Srinjay

Author: Srinjay

सृंजय

जन्म : 25 जनवरी, 1961 को भोजपुर जनपद (बिहार) के तेतरिया गाँव में।

शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी)।

शुरू में पिता के रूढ़िमुक्त मानवतावादी विचारों और ज्येष्ठ भ्राता श्री राधेश्याम मिश्र की समाजवादी विचारधारा और सादगीपूर्ण जीवन-शैली से गहरे प्रभावित, फिर आर्य समाज से जुड़ाव और देशाटन, और फिर वामपंथी श्रम संगठनों एवं दलों से गहरी सम्बद्धता। सन् 1984 से साहित्य की ओर प्रवृत्त।

प्रमुख कृतियाँ : ‘कामरेड का कोट, ‘नंगा’।

कुछ कहानियों का विभिन्न भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद।

आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से रचनाओं और वार्ताओं का प्रसारण।

सम्मान : ‘तख़्त-ओ-ताब’ कहानी पर सन् 1989 का ‘कृष्णप्रताप स्मृति पुरस्कार’।

सम्प्रति : सहायक निदेशक (राजभाषा), भारत संचार निगम लिमिटेड, आसनसोल।

 

 

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