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Meerabai Ki Sampurna Padawali-Hard Cover

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भक्तिकाल में मीराँ की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई थी। मीराँ के विषय में अनेक किंवदन्तियाँ भी गढ़ ली गईं। किंवदन्तियाँ भले ही ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित न हों, किन्तु उनसे इतना अवश्य ज़ाहिर होता है कि मीराँ अपनी विद्रोही चेतना के कारण लोकप्रिय अवश्य हो गई थीं। जो रचनाकार जितना अधिक लोकप्रिय होता है, उतना अधिक उसके कृतित्व का देशकाल के अनुसार रूपान्तरण होता है। मीराँ के पद गेय थे, अत: एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में साधु, सन्तों तथा गायकों के द्वारा मौखिक ढंग से प्रचारित-प्रसारित होते रहे। मीराँ सर्जनात्मक चेतना को भी उद्वेलित करती हैं।

मीराँ के पदों में पाठ-भेद होने के लिए प्रादेशिक भेद तथा मौखिक गेय परम्परा को ज़िम्मेदार ठहराया गया है। उनके औचित्य पर प्रश्नचिह्न लगाए बिना एक सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि मीराँ ने कुछ पदों को दुबारा कुछ विस्तार से तथा कुछ परिवर्तन के साथ गाया होगा। आत्मोल्लास या उन्माद के क्षणों में गाए जानेवाले गीतों में गायक को इसकी सुध-बुध कहाँ रहती है कि वह अपने पूर्व कथन को दुहरा रहा है। उन्होंने अपने जीवन में घटित हुए कटु एवं तीक्ष्ण अनुभवों को वाणी दी है, राणा के द्वारा जो व्यवहार किया गया था, मीराँ भावावेश के क्षणों में उनका कई पदों में स्मरण करती हैं और भगवद् कृपा की महिमा का अनुभव करती हैं।

शोधार्थियों और अध्‍येताओं के लिए एक बहुत ही महत्‍त्‍वपूर्ण और संग्रहणीय पुस्‍तक।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2013
Edition Year 2024, Ed. 4th
Pages 253p
Price ₹600.00
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 1.5
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Ramkishor Sharma

Author: Ramkishor Sharma

प्रो. रामकिशोर शर्मा

जन्म : 9 अक्टूबर, 1949 को भैरोपुर, सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश में)।

शिक्षा : इलाहाबाद विश्वविद्यालय से डी.फ़िल. की उपाधि।

प्रकाशन : ‘अपभ्रंश मुक्तक काव्य और उसका हिन्दी पर प्रभाव’, ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’, ‘आधुनिक कवि’, ‘प्रेमचन्द की कहानियाँ : संवेदना और शिल्प’, ‘प्रयोजनमूलक हिन्दी’, ‘कबीरवाणी : कथ्य और शिल्प’, ‘हिन्दी साहित्य का समग्र इतिहास’ (आलोचना); ‘हिन्दी भाषा का विकास’, ‘आधुनिक भाषाविज्ञान के सिद्धान्त’, ‘भाषाविज्ञान’, ‘हिन्दी भाषा और लिपि’, ‘भाषा चिन्तन के नए आयाम’ (भाषाविज्ञान); गौरी (उपन्यास)। सम्पादन : ‘सम्मेलन पत्रिका’।

सम्मान : ‘अक्षयवट’, ‘हिन्दुस्तानी अकादमी’, ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ आदि संस्थाओं द्वारा सम्मानित।

भारत के अनेक विश्वविद्यालयों, लोक सेवा आयोगों में शैक्षणिक एवं मूल्यांकन सम्बन्धी कार्यों में सहयोग। लगभग 50 राष्ट्रीय, अन्‍तरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में भागीदारी। अनेक पुरस्कार समितियों के निर्णायक मंडल के सदस्य। पूर्व प्रबन्‍ध मंत्री, उपसभापति, भारतीय हिन्दी परिषद, इलाहाबाद। उपाध्यक्ष, साहित्यकार संसद, इलाहाबाद। साहित्य मंत्री, हिन्दी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद। 1979 से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में कार्यरत, प्रवक्ता, उपाचार्य, आचार्य एवं अध्यक्ष पद का दायित्व सँभाले। अनेक शोध छात्रों एवं छात्राओं को डी.फ़िल. उपाधि के लिए कुशल निर्देशन के बाद अब सेवानिवृत।

 

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