Kala Aur Sanskriti

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Kala Aur Sanskriti
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कला और संस्कृति' समय-समय पर लिखे हुए मेरे कुछ निबन्धों का संग्रह है। 'संस्कृति' मानव जीवन की प्रेरक शक्ति और राष्ट्रीय जीवन की आवश्यकता है। वह मानवी जीवन को अध्यात्म प्रेरणा प्रदान करती है। उसे बुद्धि का कुतूहल मात्र नहीं कहा जा सकता। संस्कृति के विषय में भारतीय दृष्टिकोण की इस विशेषता का प्रस्तुत लेखों में विशद वर्णन किया गया है।

लोक का जो प्रत्यक्ष जीवन है, उसको जाने बिना हम मानव जीवन को पूरी तरह नहीं समझ सकते। कारण भारतीय संस्कृति में सब भूतों में व्याप्त एक अन्तर्यामी अध्यात्म तत्‍त्‍व को जानने पर अधिक बल दिया गया है। हमारी संस्कृति उन समस्त रूपों का समुदाय है जिनकी सृष्टि ही मानवीय प्रयत्नों में यहाँ की गई है। उनकी उदात्त प्रेरणाओं को लेकर ही हमें आगे बढ़ना होगा। स्थूल जीवन में संस्कृति की अभिव्यक्ति ‘कला' को जन्म देती है। कला का सम्बन्ध जीवन के मूर्त रूप से है। कला मानवीय जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। वह कुछ व्यक्तियों के विलास साधन के लिए नहीं होती। वह शिक्षण, आनन्‍द और अध्यात्म साधना के उद्देश्‍य से आगे बढ़ती है। इसी से जहाँ जो सौन्दर्य की परम्परा बची है, उसे सहानुभूति के साथ समझ कर पुन: विकसित करना होगा। भारतीय कला न केवल रूप विधान की दृष्टि से समृद्ध है, वरन् उसकी शब्दावली भी अत्यन्त विकसित है। समय रहते कला की पारिभाषिक शब्दावली की रक्षा करना भी हमारा आवश्यक कर्त्‍तव्य है।

अन्त में यह कहा जा सकता है कि पूर्व मानव के जीवन में जो महत्त्व धर्म और अध्यात्म का था, वही अपने वाले युग में कला और संस्कृति को प्राप्त होगा।

—भूमिका से

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2019
Edition Year 2019, Ed. 1st
Pages 216p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Lokbharti Prakashan -Sahitya Bhawan
Dimensions 21.5 X 14 X 1.5
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Editorial Review

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Vasudev Sharan Agarwal

Author: Vasudev Sharan Agarwal

वासुदेवशरण अग्रवाल

जन्म : 1904

शिक्षा : 1929 में लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए., 1946 में पीएच.डी. तथा में डी.लिट् की उपाधियाँ प्राप्त कीं।

प्रकाशित कृतियाँ : ‘पृथ्वी-पुत्र’ (1949), ‘उरुज्योति’ (1952), ‘कला और संस्कृति’ (1952), ‘कल्पवृक्ष’ (1953), ‘माता भूमि’ (1953), ‘हर्षचरित - एक सांस्कृतिक अध्ययन’ (1953), ‘पोद्दार अभिनन्दन ग्रन्थ’ (1953), ‘भारत की मौलिक एकता’ (1954), ‘मलिक मुहम्मद जायसी : पद्मावत’ (1955), ‘पाणिनिकालीन भारतवर्ष’ (1955), ‘भारतसावित्री’ (1957), ‘कादम्बरी’ (1958)।

राधाकुमुद मुखर्जी कृत ‘हिन्दू सभ्यता’ का अनुवाद (1955)। ‘शृंगारहाट’ का सम्पादन डॉ. मोती चन्द के साथ मिलकर। कालिदास के मेघदूत एवं बाणभट्ट के हर्षचरित की नवीन पीठिका प्रस्तुत की। भारतीय साहित्य और संस्कृति के गम्भीर अध्येता के रूप में देश के विद्वानों में अग्रणी।

1940 तक मथुरा के पुरातत्व संग्रहालय के अध्यक्ष पद पर रहे। 1946 से लेकर 1951 तक ‘सेंट्रल एशियन एक्टिविटीज म्यूजियम’ के सुपरिंटेंडेंट और ‘भारतीय पुरातत्व विभाग’ के अध्यक्ष पद पर कार्य। 1951 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ‘कॉलेज ऑफ इंडोलॉजी’ में प्रोफ़ेसर नियुक्त हुए। 1952 में ‘लखनऊ विश्वविद्यालय’ में राधाकुमुद मुखर्जी व्याख्यान निधि की ओर से व्याख्याता नियुक्त हुए। आप ‘भारतीय मुद्रा परिषद’ (नागपुर), ‘भारतीय संग्रहालय परिषद’ (पटना) और ‘ऑल इंडिया ओरियंटल कांग्रेस’, फ़ाइन आर्ट सेक्शन (मुम्बई) आदि संस्थाओं के सभापति भी रहे।

निधन : 1966

 

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