Islam Mein Dharmik Chintan Ki Punarrachna

Literary Criticism,Religion
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Islam Mein Dharmik Chintan Ki Punarrachna

‘इस्लाम में धार्मिक चिन्तन की पुनर्रचना’ डॉ. मुहम्मद इक़बाल के उन महत्त्वपूर्ण अंग्रेज़ी व्याख्यानों का अनुवाद है जिन्हें उन्होंने मद्रास मुस्लिम एसोसिएशन के निवेदन पर तैयार किया था। ये व्याख्यान दिसम्बर, 1928 के अन्त में मद्रास और जनवरी, 1929 में हैदराबाद और अलीगढ़ में दिए गए थे।

यूरोपीय भाषाओं—जर्मन, फ़्रेंच, इतालवी तथा एशियाई भाषाओं—उर्दू, अरबी, फ़ारसी और तुर्की में इन व्याख्यानों के अनुवाद बहुत पहले हो चुके हैं। ज़रूरत थी कि दक्षिण-पूर्व एशिया की प्रमुख भाषा हिन्दी में भी इनका अनुवाद हो ताकि हिन्दीभाषी पाठक अपने दिक और काल में इस्लाम में धार्मिक चिन्तन के स्वरूप को समझने तथा इसकी पुनर्रचना के इस सबसे आधुनिक एवं समर्थ प्रयास से न केवल परिचित हो सकें, बल्कि इस्लाम में धार्मिक चिन्तन को लेकर फैलाए जा रहे प्रभावों से मुक्त होकर एक समुचित दृष्टिकोण अपना सकें।

इस पुस्तक से एक बार पुनः भारतीय दर्शन की अनेक गंगा-जमुनी समस्याओं का समाधान हो सके, इसी विश्वास के साथ एक विस्तृत परिदृश्य को रेखांकित किया गया है ताकि पाठकों एवं चिन्तकों को न केवल इक़बाल की मनोभूमि का पता चल सके, बल्कि इस्लामी चिन्तन की गहरी अर्थवत्ता और व्यापक मानवीयता का भी बोध हो सके।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back, Paper Back
Publication Year 2008
Edition Year 2008, Ed. 1st
Pages 253p
Translator Mohd. Shees Khan
Editor Not Selected
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 2
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Editorial Review

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Mohd. Ikbal

Author: Mohd. Ikbal

मुहम्मद इक़बाल

जन्म : 9 नवम्बर, 1877

अल्लामा मुहम्मद इक़बाल आधुनिक इस्लामी जगत् के एकमात्र दार्शनिक हैं जिन्होंने इस्लाम तथा इस्लामी संस्कृति के वैचारिक आधारों को अपने चिन्तन का विषय बनाया है। आधुनिक मनुष्य धार्मिक अनुभूति की एक ऐसी प्रणाली की अपेक्षा करता है जो मूर्त चिन्तन की आदतों वाले मन के लिए उपयुक्त हो। इस्लाम की धार्मिक परम्परा और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में होनेवाले नवीनतम विकास के परिप्रेक्ष्य में इस्लामी चिन्तन की पुनर्रचना में इक़बाल ने आधुनिक मन की अपेक्षाओं की पूर्ति का एक महत्त्‍वपूर्ण प्रयास किया है। पुनर्रचना में इक़बाल का उद्देश्य धर्म एवं विज्ञान के प्रवर्गों के माध्यम से उस यथार्थता की

अभिपुष्टि एवं व्याख्या करना है जिसका संज्ञान धार्मिक अनुभूति द्वारा होता है। उनका मानना है कि आधुनिक मनोविज्ञान ने धार्मिक अनुभूति की अन्तर्वस्तुओं के मूल्यांकन और विश्लेषण पर ध्यान नहीं दिया है।

शिक्षा : 1895 में एफ़.ए., मरे कॉलेज, सियालकोट; 1897 में बी.ए. और 1899 में दर्शनशास्त्र

में एम.ए., गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर; 1907 में पीएच.डी., म्यूनिख विश्वविद्यालय।

छात्र-जीवन में ही प्रसिद्ध प्राच्यविद् सर टॉमस आर्नल्ड के सम्पर्क में आए। पेशे से प्राध्यापक रहे। राजनीति में भी दख़ल, लेकिन यह जगह उन्हें रास न आई।

प्रमुख कृतियाँ : ‘अस् रारे-ख़ुदी’, ‘पयामे-मश् रिक़’, ‘बाँगे-दरा’, ‘ज़बूरे-अजम’, ‘ज़र्बे-कलीम’ आदि।

सम्मान : ‘अल्लामा, सर’ का ख़िताब।

निधन : 21 अप्रैल, 1938; लाहौर।

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