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Ila-Hard Cover

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9788126712342
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विशेष आकार और साज-सज्जा में प्रकाशित इस पुस्तक में इला डालमिया की कहानियाँ, एक उपन्यास, संस्मरण, आलेख और कवि-कथाकार-उपन्यासकार अज्ञेय से सम्बन्धित उनका लेखन शामिल है। इला डालमिया और अज्ञेय लम्बे समय तक सहजीवन में साथ थे।

उनका लेखकीय जीवन सत्तर के दशक में आरम्भ हुआ। अज्ञेय की पत्रिका ‘नया प्रतीक’ में कुछ कहानियाँ प्रकाशित हुईं, फिर अन्य पत्र-पत्रिकाओं में भी उनकी रचनाएँ छपीं। इला डालमिया की कहानियों में उनके अपने वर्ग की सोच को पकड़ा गया है। ‘नई कहानी’ आन्दोलन से अलग उन्होंने एक लयात्मक भाषा ईजाद की जिसमें उन्होंने भावप्रवण क्षणों का अंकन भी किया और अपने समय के सत्य को भी साधा।

बनता-बिगड़ता दाम्पत्य जीवन, स्त्री के दु:ख-सुख, रोज़ी-रोटी की समस्या आदि उनकी कथा-रचनाओं के केन्द्र में रहे हैं। ‘छत पर अर्पण’ उपन्यास में उन्होंने अपने ही कुछ अनुभवों को पिरोते हुए एक बड़े परिवार की लड़की की कहानी कही है, जहाँ घर की छत उसके तथा परिवार के बाक़ी लोगों के कई रहस्यों की साक्षी बनती है।

वे बहुत नहीं लिख पाईं लेकिन जितना भी लिखा, वह एक बड़ी प्रतिभा का संकेत ज़रूर देता है।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Isbn 10 8126712341
Publication Year 2006
Edition Year 2006, Ed. 1st
Pages 159p
Price ₹250.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 24.5 X 17 X 1.5
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Author: Ila Dalmiya

इला डालमिया

इला डालमिया का जन्म 1944 में हुआ। हिन्दी और अंग्रेज़ी में भावप्रवण काव्य एवं गद्य-रचना के अलावा उनकी रुचि कला, संगीत और रंगमंच में भी रही। दिल्ली में उनका घर, जहाँ वे कवि-उपन्यासकार अज्ञेय के साथ रहती थीं, साहित्यिक व कला गतिविधियों का केन्द्र था। ‘नया प्रतीक’ नाम की पत्रिका जिसे निकालने में अज्ञेय के साथ वे भी शामिल थीं, नवोन्मेषी एवं प्रयोगधर्मी लेखन के लिए जानी गई। कई निबन्धों, कहानियों और आलेखों के अलावा उन्होंने ‘छत पर अपर्णा’ नाम से एक आत्मकथात्मक उपन्यास भी लिखा। उनके निधन के कुछ समय बाद उनकी सम्पूर्ण रचनाओं का एक संग्रह ‘इला’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। कला-साहित्य के संरक्षक के रूप में उन्होंने अनेक युवा लेखकों और कलाकारों को सहयोग दिया। एक गम्भीर बीमारी के चलते उन्हें असमय हमारे बीच से जाना पड़ा, लेकिन अपने समय की संवेदनशील और प्रेरणादायक सांस्कृतिक व्यक्तित्व के रूप में वे हमेशा याद की जाती रहेंगी।

उनका निधन वर्ष 2003 में हुआ।

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