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Hindostan Hamara : Vols. 1-2-Hard Cover

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9789390971794
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‘हिन्दोस्तां हमारा’ के इस दूसरे भाग में हमने उर्दू की उन नज़्मों का एक संकलन दिया है जो शुरू से लेकर आज तक के राजनीतिक आन्दोलनों से सम्बन्ध रखती हैं। यह सच है कि उर्दू शाइरी ने हिन्दुस्तान के राजनीतिक इतिहास को पूर्ण रूप से अपने सीने में सुरक्षित कर रखा है। साथ ही, यह बात भी याद रखने योग्य है कि उर्दू शाइरी ने केवल राजनीतिक घटनाओं और स्थितियों के चित्र ही हमारे सामने पेश नहीं किए बल्कि हर युग के सामाजिक और राजनीतिक आन्दोलनों को बढ़ावा देने में उसका ज़बर्दस्त हाथ रहा।
प्राचीन शाइरों ने जो शहर–आशोब लिखे हैं उनमें अपने युग के चित्रण पर ही सन्तोष नहीं किया गया बल्कि कहीं-कहीं आलोचनात्मक दृष्टि भी डाली है। जैसे-जैसे उर्दू शाइरी आगे क़दम बढ़ाती गई उसमें वह मूल्य पैदा होते गए जो कल्पना और कला दोनों दृष्टि से उच्चस्तरीय शाइरी को जन्म देते हैं। यही नहीं, बल्कि सरदार जाफ़री के कथनानुसार—‘उर्दू वालों ने आज़ादी के संघर्ष को राष्ट्रीय परिधि तक सीमित नहीं रखा। उसके दायरे अन्तर्राष्ट्रीयता से मिलाए और इस प्रकार एक ज़्यादा जानदार और व्यापक चेतना को आम किया।’
—भूमिका से

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Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 1973
Edition Year 2026, Ed. 6th
Pages 1053p
Price ₹2,999.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 6.5
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Jaan Nisar Akhtar

Author: Jaan Nisar Akhtar

जाँ निसार अख़्तर

फरवरी, 1914 को खैराबाद, ज़िला—सीतापुर में जन्म हुआ। पिता मुज़्तर खैराबादी उर्दू के प्रसिद्ध कवियों में से थे और घर का वातावरण साहित्यिक होने के कारण उनमें बचपन से ही शे’र कहने की रुचि पैदा हुई और दस-ग्यारह वर्ष की आयु से कविता करने लगे। सन् 1939 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एम.ए. करने के बाद विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर में उर्दू के प्राध्यापक नियुक्त हुए, किन्तु 1947 में साम्प्रदायिक दंगे छिड़ जाने से त्याग-पत्र देकर भोपाल चले गए और वहाँ हमीदिया कॉलेज के उर्दू-फ़ारसी विभाग के अध्यक्ष बने। फिर 1950 में वहाँ से त्याग-पत्र देकर बम्बई चले गए। प्रारम्भ के रूमानी काव्य में धीरे-धीरे क्रान्तिकारी तत्त्वों का मिश्रण होता गया और वे यथार्थवाद की ओर बढ़ते गए। साम्राज्यवाद का विरोध और स्वदेश-प्रेम की भावना से इनकी कविता ओत-प्रोत रही। दूसरा महायुद्ध, आर्थिक दुर्दशा, राजनीतिक स्वाधीनता, विश्वशान्ति और ऐसी ही अनेक घटनाएँ हैं जिनको ‘अख़्तर’ ने वाणी प्रदान की। आज के जीवन-संघर्ष को वे कल के नव-निर्माण का सूचक मानते थे। उनके काव्य में सामाजिक यथार्थ का गहरा बोध परिलक्षित होता है और उनके काव्य का लक्ष्य वह मानव है जो प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सुन्दर, सरस और सन्तुलित जीवन के निर्माण के लिए संघर्षशील है। उनके कला-बोध की परिपक्वता एक ओर तो उनकी सम्पन्न विरासत और दूसरी ओर उर्दू-फ़ारसी साहित्य के गहन अध्ययन की देन है। प्रस्तुत पुस्तक का विषय-चयन तथा काव्य-सम्‍पादन उनकी उपर्युक्त विशेषताओं का ही परिणाम है। वे वर्षों फ़िल्म-जगत से सम्बद्ध रहे और उनके अनेक फ़िल्मी गीत विशेषतः लोकप्रिय हुए।

निधन: 18 अगस्त, 1976

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