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Hindi Upanyas Ka Itihas-Paper Back

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बीसवीं शताब्दी के अन्त के साथ हिन्दी उपन्यास की उम्र लगभग 130 वर्ष की हो चुकी है। बड़े ही बेमालूम ढंग से 1970 ई. में पं. गौरीदत्त की ‘देवरानी-जेठानी की कहानी’ के रूप में इसका जन्म हुआ, जिसकी तरफ़ लगभग सौ वर्षों तक किसी का ध्यान भी नहीं गया। लेखक ने पुष्ट तर्कों के आधार पर ‘देवरानी-जेठानी की कहानी’ को हिन्दी के प्रथम उपन्यास के रूप में स्वीकार किया है और 1970 ई. से 2000 ई. तक की अवधि में हिन्दी उपन्यास के ऐतिहासिक विकास को समझने का प्रयास किया है।

हिन्दी में प्रकाशित पुस्तकों के प्रामाणिक विवरण का अभिलेख सुरक्षित रखने की समृद्ध और विश्वसनीय परम्परा प्रायः नहीं है। इस कारण हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन में अनेक प्रकार की मुश्किलें आती हैं। इस पुस्तक में पहली बार लगभग 1300 उपन्यासों का उल्लेख उनके प्रामाणिक प्रकाशन-काल के साथ किया गया है। यह दावा तो नहीं किया जा सकता कि इस किताब में कोई महत्त्वपूर्ण उपन्यासकार या उपन्यास छूट नहीं गया है, पर इस बात की कोशिश ज़रूर की गई है। साहित्य के इतिहास में सभी लिखित-प्रकाशित रचनाओं का उल्लेख न सम्भव है न आवश्यक, इसलिए सचेत रूप में भी अनेक उपन्यासों का ज़िक्र इस पुस्तक में नहीं किया गया है।

साहित्य के इतिहास में पुस्तकों की प्रकाशन-तिथियों की प्रामाणिकता के साथ-साथ यह भी ज़रूरी होता है कि सम्बद्ध विधा के विकास की धाराओं की सही पहचान की जाए। विधा के रूप में हिन्दी उपन्यास का विकास अभी जारी है। विकास ‘ऐतिहासिक काल’ में ही होता है और इतिहास में प्रामाणिक तथ्यों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। कोशिश यह की गई है कि यह पुस्तक हिन्दी उपन्यास का मात्र ‘इतिहास’ न बनकर ‘विकासात्मक इतिहास’ बने।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2023
Edition Year 2025, Ed. 2nd
Pages 498p
Price ₹499.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 4
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Gopal Ray

Author: Gopal Ray

गोपाल राय

गोपाल राय का जन्म 13 जुलाई, 1932 को बक्सर, बिहार के गाँव चुन्नी में हुआ था। उनकी आरम्भिक शिक्षा गाँव और निकटस्थ कस्बे के स्कूल में हुई। उन्होंने हिन्दी विभाग, पटना विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर किया। पटना विश्वविद्यालय से ही 1964 में ‘हिन्दी कथा साहित्य और उसके विकास पर पाठकों की रुचि का प्रभाव’ विषय पर डी.लिट. की उपाधि प्राप्त की। 21 फरवरी, 1957 को पटना विश्वविद्यालय, पटना में हिन्दी प्राध्यापक के रूप में उनकी नियुक्ति हुई जहाँ से 4 दिसम्बर, 1992 को सेवानिवृत्त हुए।

उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं—‘हिन्दी कथा साहित्य और उसके विकास पर पाठकों की रुचि का प्रभाव’, ‘हिन्दी उपन्यास कोश’ (दो खंडों में), ‘उपन्यास का शिल्प’, ‘अज्ञेय और उनके उपन्यास’, ‘हिन्दी भाषा का विकास’, ‘हिन्दी कहानी का इतिहास’ (तीन खंडों में), ‘उपन्यास की पहचान श्रृंखला’ के अन्तर्गत—‘शेखर : एक जीवनी’, ‘गोदान : नया परिप्रेक्ष्य’, ‘रंगभूमि : पुनर्मूल्यांकन’, ‘मैला आँचल’, ‘दिव्या’, ‘महाभोज’, ‘हिन्दी उपन्यास का इतिहास’, ‘उपन्यास की संरचना’, ‘अज्ञेय और उनका कथा-साहित्य’। उन्होंने पं. गौरीदत्त कृत ‘देवरानी-जेठानी की कहानी’, ‘राष्ट्रकवि दिनकर’ का सम्पादन किया। कई वर्षों तक समीक्षा पत्रिका का सम्पादन-प्रकाशन भी किया।

25 सितम्बर, 2015 को उनका निधन हुआ। 

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