Hindi Gadya : Vinyas Aur Vikas

Literary Criticism
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Hindi Gadya : Vinyas Aur Vikas
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वर्तमान युग गद्य है, अच्छे और बुरे दोनों अर्थों में। इस दृष्टि से गद्य की प्रकृति और उसके विकास को समझने का क्रम आधुनिक साहित्य की समग्र परम्परा को देखने-परखने की प्रक्रिया तो है ही, एक व्यापक स्तर पर वह समूची हिन्दी जाति की मानसिकता को समझने का यत्न भी है। आलोचक रामस्वरूप चतुर्वेदी की अभिनव कृति ‘हिन्दी गद्य : विन्यास और विकास’ यही काम करती है। गद्य विषयक तथ्य-सामग्री यहाँ जितनी विश्वसनीय है, उतना ही गद्य का विवेचन अपने में स्वयं गद्य का मानक रूप बन सका है। इस द्विस्तरीय उपलब्धि का अनुमान पुस्तक के किसी भी अंश को पढ़ने पर आसानी से हो सकता है। फिर गद्य के प्रसार और विस्तार में काव्य-रूपों का उदय कैसे होता है, यह मौलिक विवेचन प्रस्तुत अध्ययन की निजी विशेषताओं में से एक है। ग्रन्थ का विवेचन-क्रम तीन खंडों में चलता है। प्रथम खंड में गद्य की सामान्य प्रकृति का विश्लेषण है, द्वितीय में हिन्दी गद्य के एक हज़ार वर्षों का विकास-क्रम सोदाहरण विस्तार में अंकित हुआ है, और तीसरे तथा अन्तिम खंड में हिन्दी के प्रमुख गद्यकारों का सम्रग्र तथा स्वतंत्र रूप से विवेचन है। अन्त में कई परिशिष्टों के अन्तर्गत गद्यविषयक कुछ सामान्यत: दुर्लभ सामग्री सँजोई गई है, जो हर स्तर के अध्येता के लिए रुचिकर और उपयोगी दोनों होगी। यों गद्य आज जैसे समस्त जीवन में परिव्याप्त है उसके अनुकूल ही इस अध्ययन को परिपूर्ण बनाने का आलोचकीय यत्न है विविध वर्ग के पाठकों की तुष्टि कर सकने के लिए।

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Language Hindi
Format Hard Back
Edition Year 2018, Ed. 5th
Pages 314p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Lokbharti Prakashan
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Editorial Review

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Ramswaroop Chaturvedi

Author: Ramswaroop Chaturvedi

रामस्वरूप चतुर्वेदी

जन्म : 1931 में कानपुर में। आरम्भिक शिक्षा पैतृक गाँव कछपुरा (आगरा) में हुई। बी.ए. क्राइस्ट चर्च, कानपुर से। एम.ए. की उपाधि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1952 में। वहीं हिन्दी विभाग में अध्यापन (1954-1991)। डी.फ़िल की उपाधि 1958 में मिली, डी.लिट. की 1972 में।

आरम्भिक समीक्षापरक निबन्ध 1950 में प्रकाशित हुए। नई प्रवृत्तियों से सम्‍बद्ध पत्रिकाओं का सम्पादन किया : ‘नए पत्ते’ (1952), ‘नई कविता’ (1954), ‘क ख ग’ (1963)। शोध-त्रैमासिक ‘हिन्दी अनुशीलन’ का सम्पादन (1960-1984)।

प्रकाशन : ‘शरत् के नारी पात्र’ (1955), ‘हिन्दी साहित्य कोश’ (सहयोग में सम्‍पादित—प्रथम भाग 1958, द्वितीय भाग 1963), ‘हिन्दी नवलेखन’ (1960), ‘आगरा ज़िले की बोली’ (1961), ‘भाषा और संवेदना’ (1964), ‘अज्ञेय और आधुनिक रचना की समस्या’ (1968), ‘हिन्दी साहित्य की अधुनातन प्रवृत्तियाँ’ (1969), ‘कामायनी का पुनर्मूल्यांकन’ (1970), ‘मध्यकालीन हिन्दी काव्यभाषा’ (1974), ‘नई कविताएँ : एक साक्ष्य’ (1976), ‘कविता-यात्रा’ (1976), ‘गद्य की सत्ता’ (1977), ‘सर्जन और भाषिक संरचना’ (1980), ‘इतिहास और आलोचक-दृष्टि’ (1982), ‘हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास’ (1986), ‘काव्यभाषा पर तीन निबन्ध’ (1989), ‘प्रसाद-निराला-अज्ञेय’ (1989), ‘साहित्य के नए दायित्व’ (1991), ‘कविता का पक्ष’ (1994), ‘समकालीन हिन्दी साहित्य : विविध परिदृश्य’ (1995), ‘हिन्दी गद्य : विन्यास और विकास’ (1996), ‘तारसप्तक से गद्यकविता’ (1997), ‘भारत और पश्चिम : संस्कृति के अस्थिर सन्दर्भ’ (1999), ‘आचार्य रामचन्‍द्र शुक्ल—आलोचना का अर्थ : अर्थ की आलोचना’ (2001), ‘भक्ति काव्य-यात्रा’ (2003)।

संयुक्त संस्करण : ‘भाषा-संवेदना और सर्जन’ (1996), ‘आधुनिक कविता-यात्रा’ (1998)।

सन् 1996 में ‘व्यास सम्मान’ से सम्‍मानित।

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