Griha Vatika

Author: Pratibha Arya
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Griha Vatika
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आज से हज़ारों वर्ष पूर्व भी मनुष्य अपने घर के चारों ओर फूल, घास व कमल के तालाब आदि लगाता रहा होगा। बेबीलोन के ‘हैंगिंग गार्डन’ विश्व के सात आश्चर्यों में एक माने गए हैं। आज जब हम गृह वाटिका की बात करते हैं तो हमारे सामने उद्यान कला का एक दीर्घ इतिहास साकार हो उठता है। रूप योजना कैसी भी क्यों न रही हो, घर के भीतर, आसपास, रास्तों, दीवारों को, फूलों की झाड़ियों, लताओं, वृक्षों द्वारा सजाने की परम्परा बहुत पुरानी रही है। गुफाओं में रहनेवाले मानव ने जब घर बनाकर स्थिर जीवनचर्या शुरू की तो उसे सजाने-सँवारने का काम भी शुरू कर दिया। जीवन में जब स्थिरता आ जाती है तो मानव-मन कला-सौन्दर्य की ओर झुक जाता है। प्राचीन भारतीय उद्यानों में लतामंडप, पुष्पित लताओं, झाड़ियों वाली वीथियाँ, कुंज, सुगन्धित पुष्प व कमल फलों के जलाशयों का वर्णन मिलता है। वासन्ती लता, लवंग-लता, नवमल्लिका जैसी सुगन्धित लताओं एवं वृक्षों के झुरमुट से घिरी वीथियाँ एवं वाटिकाएँ, जहाँ गृहवासी अपने परिवार के सदस्यों के साथ आमोद-प्रमोद के क्षण व्यतीत करता था। मुग़लकालीन उद्यान सीढ़ीदार होते थे, साथ-साथ उनमें पानी की नहरें व फुहारें अवश्य होते थे। मध्य एशिया से सर्द एवं फलों से भरे प्रदेश से आए मुग़ल बादशाहों ने वहाँ की स्मृति को याद रखते हुए और भारत की गर्मी से बचने के लिए जल की योजना वाटिकाओं में ख़ूब बनाई। उद्यान की योजना का रूप, आकार चाहे अलग रहा हो परन्तु मूल में एक प्रवृत्ति ही काम करती रही—वह थी प्रकृति की सुन्दर आकर्षक विविध प्रकार की वनस्पतियों, पौधों, झाड़ियों, वृक्षों, लताओं को आकर्षक रूप में लगाना, उसे सँजोना और प्राकृतिक भूदृश्यों को अपनी कल्पना के पुट द्वारा अपने घर के भीतर प्रस्तुत करना।

उद्यान कला के भी मूलभूत सिद्धान्त लगभग सभी जगहों पर एक जैसे ही होते हैं। इन्हें जानने व समझने के बाद पौधों की देखभाल का कार्य काफ़ी सरल हो जाता है। उद्यान कला एक वैज्ञानिक विषय है, परन्तु शौक़ के रूप में अपनाए जाने पर यह आनन्द व अनुभव का विषय बन जाता है।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2002
Edition Year 2021, Ed. 2nd
Pages 171P
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22.5 X 14.5 X 1.5
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Pratibha Arya

Author: Pratibha Arya

प्रतिभा आर्य

जन्म : 1938 में अविभाजित भारत के लाहौर शहर में, परन्तु बचपन रुड़की, ज़िला हरिद्वार, उत्तरांचल में बीता। आरम्भिक शिक्षा रुड़की और उच्च शिक्षा लखनऊ में सम्पन्न हुई। मातृभाषा पंजाबी है, परन्तु हिन्दी, अंग्रेज़ी के अतिरिक्त उर्दू, संस्कृत व बांग्ला भाषा का भी पर्याप्त ज्ञान है।

1968 से 1983 तक दिल्ली की सर्वोत्तम व्यक्तिगत गृह वाटिका का पुरस्कार लगातार प्राप्त किया। दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित पुष्प प्रदर्शनियों में अनेक ट्राफ़ियों के साथ सर्वोच्च चैलेंज कप कई वर्षों तक लगातार जीतकर इस क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित किया। पिछले दो दशक से भी अधिक समय से ‘वामा’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘संडे आब्जर्वर’, ‘कादम्बिनी’, ‘गृहशोभा’, ‘फलफूल’, ‘खेती’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में पर्यावरण, बाग़वानी एवं वृक्ष व पौधों पर लेखन। अब तक ढाई सौ से अधिक लेख छप चुके हैं। भारतीय मूल के वृक्षों पर साहित्यिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से सुन्दर अनुसन्धानात्मक लेख लिखे। मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी में पिछले अखिल भारतीय सेवाओं के प्रशिक्षणार्थियों के लिए बागवानी पर कार्यशालाएँ प्रस्तुत कीं। गुलाब, गुलदाउदी, डहलिया, कैक्टस व बोगनवेलिया की राष्ट्रीय संस्थाओं की आजीवन सदस्या और विभिन्न प्रसिद्ध पुष्प प्रदर्शनियों के निर्णायक मंडल में शामिल हैं।

प्रमुख कृतियाँ : ‘पेड़ों की कहानी’, पेड़ों की ज़ुबानी’ (सचित्र बालोपयोगी), ‘कुटकुट का कमाल’, ‘घोंसले की तलाश’ (बालोपयोगी कथा-पुस्तकें) एवं ‘महागाथा वृक्षों की’, ‘गृह वाटिका’ आदि।

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