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Ghananad Ka Kavya-Paper Back

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घनानन्द के काव्य में भावस्थितियों के विकास का कोई क्रम बना-बनाया नहीं मिलता, किन्तु उनके शृंगार-काव्य में उसे ढूँढ़ना कठिन भी नहीं है। प्रिय के असाधारण रूप के प्रति आश्रय की रीझ, पूर्वराग की आवेगदशा, असाधारण सुख के अतिरेक के साथ रंकवत लालसा की सीत्कार और ‘शुद्ध सामीप्य’ जैसी तन्मयता वाला संयोग और उस संयोग के बाद स्वभावतः तीव्र विरहानुभूति, यह सब कुछ उनके काव्य में है।

घनानन्द में अतृप्ति है तो इस स्तर की है। इसके आधार पर इनको प्रेम का सुख न प्राप्त कर सकनेवाला भाग्यहीन नहीं घोषित किया जा सकता।

प्रेम के ऐसे विलक्षण अनुभव के बाद ही घनानन्द का विरह इतना तीव्र आवेगमय, इतना करुण और इतना गम्भीर हो सका है कि संसार की दृष्टि में प्रेम के सर्वश्रेष्ठ प्रतीक मीन और पतंग इनके सामने कायर और कपूत होकर हर जाते हैं।

घनानन्द के काव्य के शिल्प-पक्ष के सम्बन्ध में भी ऐसे ही निष्कर्ष निकाले गए हैं : ‘कवि की प्रवृत्ति अपने हृदय की परत खोलने की अधिक होती है, अपनी उक्ति को सजाने-सँवारने की कम।’

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2019
Edition Year 2019, Ed. 1st
Pages 118p
Price ₹90.00
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 21.5 X 13.5 X 0.5
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Author: Ramdev Shukla

रामदेव शुक्ल

जन्म : शाहपुर कुरमौटा, कुशीनगर (उ.प्र.)।

कार्य : आचार्य-अध्यक्ष, हिन्‍दी विभाग, गोरखपुर विश्‍वविद्यालय, गोरखपुर के पद से 1998 में सेवानिवृत्त। फ़िलहाल ‘प्रेमचन्‍द साहित्‍य संस्‍थान’ के अध्‍यक्ष-पद पर नियुक्‍त।
प्रकाशन : ग्यारह उपन्यास, छह कहानी-संग्रह, आठ आलोचना-ग्रन्‍थ, दो दर्जन से अधिक सम्‍पादित ग्रन्‍थ, साठ से अधिक पुस्तकों में सह-लेखन।
सम्मान : ‘विद्याभूषण’, ‘कथाश्री’, ‘भारतेन्‍दु सम्मान’, ‘सेतु शिखर सम्मान’, ‘श्रुति कीर्ति शिखर सम्मान’, ‘भारत-भारती शताब्दी सम्मान’ आदि।

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