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Ghadi Do Ghadi-Paper Back

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बसंत त्रिपाठी संभावनाओं की कविता लिखते हैं—वह अपनी समकालीनता के अनुवादक नहीं, उसके मर्माहत निर्वचक हैं। उनकी कविता अपने को खोजने की कविता है। इस खोज में क्या वह अपने को पा लेते हैं? दरअस्ल, अपने को खोने और पाने का यह असमंजस उनकी कविता का केन्द्रीय स्वर है। और, अपने को पाना अन्तस के किसी अमूर्तन को नहीं एक ज़िम्मेदार नागरिक नैतिकता को आयत्त करना है। अपने को खोजने वाली इस कविता में गहनता और मार्मिकता ऐसी है कि कविता अतिक्रमण और अतिलंघन से बची रहती है। बसन्त त्रिपाठी कविता की एक लम्बी यात्रा पूरी कर चुके हैं। इसके बावजूद उनकी कविता में महत्त्वाकांक्षा की अतिशयता और अतिरिक्तता नहीं है। महत्त्वाकांक्षा नहीं, यह आकांक्षा से भरी कविता है। एषणा, प्रेम और फूलों, बादलों, शामों और उसके तमाम तरह के रंगों, हवाओं, पक्षियों, उनके कलरवों, जल और उसकी तरह-तरह की आवाज़ों से बनी उनकी कई कविताओं में प्रकृति मनुष्य के अनन्य और अपरिहार्य कॉमरेड की तरह मौजूद है। मानवीय हताशा से ये कविताएँ बचती नहीं हैं लेकिन हैं ये कविताएँ मानवीय जिजीविषा के अन्यतम वृत्तान्त, जो अपनी मृदुलता और बाज़ दफ़ा गीतमयता में उपस्थित हैं, जिसकी अन्तर्लय है तो सूक्ष्म लेकिन बेहद आलोड़नकारी। कहना पड़ेगा कि बसंत त्रिपाठी उस उद्देश्य को जानना चाहते हैं जिसकी वजह से मनुष्य का अस्तित्व अर्थवान हो सकता है। अराजनीतिक होने का संभ्रम पैदा करने वाली ये कविताएँ अपने विन्यास, मंतव्य और विधान में एक उन्नायक मानवीयता को पाने की कविताएँ हैं। किसी चिन्तित अकेलेपन से निकलती ये कविताएँ जनक्षेत्र और समूह के दुख और जिजीविषा की आदिमता और आधुनिकता को एक साथ अनुभूत और अभिव्यक्त करती हैं।

     —देवी प्रसाद मिश्र

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2024
Edition Year 2024, Ed. 1st
Pages 120p
Price ₹250.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 1
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Basant Tripathi

Author: Basant Tripathi

बसंत त्रिपाठी

बसंत त्रिपाठी का जन्म 25 मार्च, 1972 को भिलाई नगर, छत्तीसगढ़ में हुआ। उन्होंने एम.ए. (हिन्दी) किया और पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की।

उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं—‘मौजूदा हालात को देखते हुए’, ‘सहसा कुछ नहीं होता’, ‘उत्सव की समाप्ति के बाद’, ‘नागरिक समाज’, ‘घड़ी दो घड़ी’ (कविता-संग्रह); ‘शब्द’ (कहानी-संग्रह); ‘प्रसंगवश’ (आलोचना)। ‘राष्ट्रभाषा का सवाल’, ‘डॉ. रामविलास शर्मा : जनपक्षधरता की वैचारिकी’, ‘मीरांबाई’, ‘मुक्तिबोध’ (सम्पादन)। उन्होंने क्रान्तिकारियों के जीवन-दर्शन पर केन्द्रित सात पुस्तिकाओं का सम्पादन भी किया है।

नागपुर के एक महाविद्यालय में 22 वर्ष अध्यापन के पश्चात वर्तमान में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन।

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