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Diyasalai-Hard Cover

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‘दियासलाई’ नोबेल शान्ति पुरस्कार से सम्मानित और भारत समेत पूरे विश्व में बच्चों के प्रति संवेदना को एक आवश्यक लोकतांत्रिक मूल्य के रूप में स्थापित करनेवाले कैलाश सत्यार्थी की आत्मकथा है। अपनी इस आत्मकथा में वे हमें अपने संघर्षपूर्ण जीवन की कथा भी बताते हैं और अपने उन प्रयासों की भी जानकारी देते हैं जो उन्होंने भारत और विश्व-भर के बच्चों की मुक्ति और कल्याण के लिए किए।

वे ही ‌थे जिन्हें ‘ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर’ जैसे महा-आन्दोलन का विचार आया और जिसके तहत उन्होंने दुनिया के 186 देशों की यात्रा करते हुए लाखों बच्चों से सम्पर्क किया और उन्हें आजादी के विचार से अवगत कराया।  शिक्षा के लिए भी उन्होंने विश्व-स्तर पर कैम्पेन चलाया।

अपने मानवीय और सामाजिक कार्यों के लिए उन्हें अनेकों बार पुरस्कृत भी किया गया लेकिन अपना वास्तविक पुरस्कार वे उन बच्चों की मुस्कराहट को मानते हैं, जो उन्होंने हर ओर से निराश और समाज के क्षुद्र स्वार्थों की भेंट चढ़े बच्चों को दी।

सहज और सम्प्रेषणीय भाषा में लिखी हुई उनकी यह आत्मकथा हमें प्रेरित भी करती है, संवेदनशील भी बनाती है और उन भीषण तथ्यों से भी परिचित कराती है जाे हमारे सामने दुनिया के विराट नक़्शे पर बिलखते बच्चों का पता देते हैं। 

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 420p
Price ₹999.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 25.5 X 16.5 X 3
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Kailash Satyarthi

Author: Kailash Satyarthi

कैलाश सत्यार्थी

कैलाश सत्यार्थी का जन्म 11 जनवरी, 1954 को विदिशा, मध्य प्रदेश में हुआ। उन्होंने भोपाल विश्वविद्यालय (अब बरकतुल्ला विश्वविद्यालय) से बी.ई. और उसके बाद ट्रांसफ़ॉर्मर डिज़ाइन में मास्टर्स डिप्लोमा किया। किशोरावस्था से ही सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध मुखर रहे। छुआछूत, बाल विवाह आदि के ख़िलाफ़ अभियान चलाया। उनकी अगुआई में 1981 से अब तक, सवा लाख से अधिक बच्चे बाल मज़दूरी और ग़ुलामी से मुक्त कराए जा चुके हैं। इस क्रम में छापामार कार्रवाइयों के दौरान कई बार जानलेवा हमले भी झेले। 1998 में बालश्रम विरोधी विश्वयात्राका आयोजन किया जो 103 देशों से होकर गुज़री और लगभग छह महीने चली। परिणामस्वरूप ख़तरनाक क़िस्म की बाल- मज़दूरी रोकने के लिए अन्तरराष्ट्रीय क़ानून बना जिसे सभी राष्ट्र लागू कर चुके हैं। विश्वभर के बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए 1999 में ग्लोबल कैंपेन फ़ॉर एजुकेशनकी शुरुआत की। शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के लिए 2001 में भारत यात्राकी। परिणामस्वरूप देश के संविधान में संशोधन हुआ और शिक्षा का अधिकार क़ानून बना। भारत में बाल यौन शोषण और ट्रैफ़िकिंग के ख़िलाफ़ 2017 में 11 हज़ार किलोमीटर की भारत यात्राकी जो यौन अपराधों के लिए सख़्त क़ानून के निर्माण में उत्प्रेरक बनी। बाल मज़दूरी और दुर्व्यापार रोकने के लिए भारत और दक्षिण एशियाई देशों में कई मार्च आयोजित किए। ग़ुलामी और बाल मज़दूरी से मुक्त कराए गए बच्चों के पुनर्वास, शिक्षा और नेतृत्व निर्माण के लिए मुक्ति आश्रम, बाल आश्रम और बालिका आश्रमों की स्थापना की। मानवता के प्रति उल्लेखनीय योगदानों के लिए उन्हें नोबेल शान्ति पुरस्कार’ (2014), ‘डिफ़ेंडर्स ऑफ़ डेमोक्रेसी अवॉर्ड’, ‘मेडल ऑफ़ इटैलियन सीनेट’, ‘रॉबर्ट एफ़. कैनेडी ह्यूमन राइट्स अवॉर्ड’, ‘हार्वर्ड ह्यूमैनिटेरियन अवॉर्डआदि कई पुरस्कार और सम्मान प्रदान किए जा चुके हैं। कई विश्वविद्यालयों ने उन्हें पी-एच.डी. की मानद उपाधि देकर सम्मानित किया है। उनकी आधा दर्ज़न से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं।

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