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Dheere Bahe Done Re : Vols. 1-2-Hard Cover

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इस वृहद् उपन्यास की जटिल संरचना और प्लॉट के पीछे इतिहास की नियमसंगत निरन्तरता का विचार उपस्थित है। शोलोख़ोव दो दुनियाओं के बीच के संघर्ष की भव्यता से पाठक का साक्षात्कार कराते हैं। स्थापित सामाजिक सम्बन्धों, संस्थाओं, परम्पराओं, रीति-रिवाजों की दुनिया टूट-बिखर रही है और एक नई दुनिया उभर रही है, स्वयं को स्थापित कर रही है। महत्त्वपूर्ण सामाजिक मुद्‌दों के साथ ही उपन्यास व्यक्ति और जन-समुदाय की ऐतिहासिक नियति के बीच के सम्बन्ध, ऐतिहासिक आवश्यकता और चयन की स्वतंत्रता के प्रश्न तथा त्रासदीपूर्ण संघर्षों और नाटकीय परिणतियों को जन्म देनेवाली ऐतिहासिक परिस्थितियों पर सोचने-विचारने के लिए पाठक को उकसाता है और उन सभी बिन्दुओं पर काव्यात्मक न्यायपूर्ण एवं तर्कपूर्ण अवस्थिति प्रस्तुत करता है।

शोलोख़ोव की कुशलता यह है कि यह सब कुछ वह कला की शर्तों पर नहीं करते बल्कि, इनके द्वारा अपनी कला को और अधिक उन्नत बनाते हैं। वे 'जनगण की नियतियों के महाकाव्यात्मक वर्णन की परम्परा को रचनात्मक ढंग से विकसित करते हुए, एक ऐतिहासिक प्रक्रिया के अंग के रूप में जनता के व्यापक आन्दोलनों के चित्र उपस्थित करते हैं। उपन्यास की कहानी ग्रिगोरी मेलेख़ोव के इर्द-गिर्द आगे बढ़ती है, लेकिन इसका वास्तविक नायक यही जनता है।

‘धीरे बहे दोन रे...’ क्रान्ति और गृहयुद्ध के दौरान कज़्ज़ाकों के आन्तरिक और बाह्य जगत में मची उथल-पुथल और बदलावों का ग्राफ़िक चित्रण प्रस्तुत करता है। 'धीरे बहे दोन रे' ने शोलोख़ोव को न केवल सोवियत लेखकों की अग्रिम पंक्ति में स्थापित कर दिया, बल्कि उन्हें विश्व-स्तर पर चर्चित लेखक बना दिया। इसके लिए उन्हें 1941 में ‘स्तालिन पुरस्कार से’ सम्मानित किया गया।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Gopi Krishna Gopesh
Editor Not Selected
Isbn 10 8126707151
Publication Year 2003
Edition Year 2003, Ed. 1st
Pages 1250p
Price ₹1,100.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 9
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Mikhaiel Sholokhov

Author: Mikhaiel Sholokhov

मिखाइल शोलोख़ोव

जन्म : 24 मई (पुराने कैलेंडर के अनुसार 11 मई), 1905, वेशेन्स्काया, रूस।

गोर्की के उत्तराधिकारियों की पीढ़ी के अग्रणी लेखक। साहित्य के लिए वर्ष 1965 का ‘नोबेल पुरस्कार’ मिला। सोवियत संघ की विज्ञान अकादमी के सदस्य रहे। 1932 से सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य। चार खंडों वाले विश्व–प्रसिद्ध उपन्यास ‘धीरे बहे दोन रे...’ के लिए ‘स्तालिन पुरस्कार’ (1941) और ‘कुँवारी धरती’ (दो ख्ंड) के लिए ‘लेनिन पुरस्कार’ (1960) मिला।
कज़्ज़ाक़ इलाक़े के एक किसान परिवार में जन्मे शोलोख़ोव ने 1918 तक विभिन्न हाईस्कूलों में शिक्षा प्राप्त की। गृहयुद्ध ने इस सिलसिले को बीच में ही तोड़ दिया। शोलोख़ोव ने बोल्शेविकों का पक्ष लिया और लाल सेना में शामिल होकर श्वेत गार्डों और उनके कज़्ज़ाक़ समर्थकों से लड़े। गृहयुद्ध के बाद, 1922 में पत्रकार बनने के लिए मास्को चले गए। शुरू में अख़बारों में कुछ कहानियाँ छपीं। 1926 में ‘दोन की कहानियाँ’ नामक कहानियों की पहली पुस्तक छपी। 1925 में ही ‘धीरे बहे दोन रे...’ का लेखन शुरू किया। इसका चौथा और अन्तिम खंड 1940 में छपा।
कुछ कहानियों को छोड़कर, शोलोख़ोव का पूरा कथा–संसार दक्षिणी रूस के दोन क्षेत्र के कज़्ज़ाक़ों के जीवन में आवेगमय आधी सदी के दौरान आए परिवर्तनों के सूक्ष्म, व्यापक और वैविध्यपूर्ण चित्र उपस्थित करते हुए क्रान्तिकारी यथार्थवाद और मानवतावाद के सीमान्तों को नया विस्तार देता प्रतीत होता है।

निधन : 21 फरवरी, 1984, वेशेन्स्काया, सोवियत संघ।

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