Facebook Pixel

Dastambu-Hard Cover

Special Price ₹420.75 Regular Price ₹495.00
15% Off
In stock
SKU
9788126723447
- +
Share:
Codicon

मिर्ज़ा असद-उल्लाह ख़ाँ ग़ालिब का नाम भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के महान कवियों में शामिल है!

मिर्ज़ा ग़ालिब ने 1857 के आन्दोलन के सम्बन्ध में अपनी जो रूदाद लिखी है, उससे उनकी राजनीतिक विचारधारा और भारत में अंग्रेज़ी राज के सम्बन्ध में उनके दृष्टिकोण को समझने में काफ़ी मदद मिल सकती है! अपनी यह रूदाद उन्होंने लगभग डायरी की शक्ल में प्रस्तुत की है। और फ़ारसी भाषा में लिखी गई इस छोटी-सी पुस्तिका का नाम है—‘दस्तंबू’। फ़ारसी भाषा में 'दस्तंबू' शब्द का अर्थ है पुष्पगुच्छ, अर्थात् बुके (Bouquet)।

अपनी इस छोटी-सी किताब 'दस्तंबू' में ग़ालिब ने 11 मई, 1857 से 31 जुलाई, 1857 तक की हलचलों का कवित्वमय वर्णन किया है।

'दस्तंबू' में ऐसे अनेक चित्र हैं जो अनायास ही पाठक के मर्म को छू लेते हैं। किताब के बीच-बीच में उन्होंने जो कविताई की है, उसके अतिरिक्त गद्य में भी कविता का पूरा स्वाद महसूस होता है। जगह-जगह बेबसी और अन्तर्द्वन्द्व की अनोखी अभिव्यक्तियाँ भरी हुई हैं।

इस तरह 'दस्तंबू' में न केवल 1857 की हलचलों का वर्णन है, बल्कि ग़ालिब के निजी जीवन की वेदना भी भरी हुई है।

‘दस्तंबू’ के प्रकाशन को लेकर ग़ालिब ने अनेक लम्बे-लम्बे पत्र मुंशी हरगोपाल ‘तफ़्त:’ को लिखे हैं। अध्येताओं की सुविधा के लिए सारे पत्र पुस्तक के अन्त में दिए गए हैं।

भारत की पहली जनक्रान्ति, उससे उत्पन्न परिस्थितियाँ और ग़ालिब की मनोवेदना को समझने के लिए ‘दस्तंबू’ एक ज़रूरी किताब है। इसे पढ़ने का मतलब है सन् 1857 को अपनी आँखों से देखना और अपने लोकप्रिय शाइर की संवेदनाओं से साक्षात्कार करना।

—भूमिका से

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Editor Not Selected
Publication Year 2012
Edition Year 2023, Ed. 2nd
Pages 103p
Price ₹495.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 21.5 X 14.5 X 1
Write Your Own Review
You're reviewing:Dastambu-Hard Cover
Your Rating
Mirza Ghalib

Author: Mirza Ghalib

मिर्ज़ा ग़ालिब

भारतीय साहित्य की एक गौरवान्वित शख़्सियत।

जन्म : 27 दिसम्बर, 1797; आगरा।

उर्दू और फ़ारसी, दोनों भाषाओं के अज़ीम शाइर और गद्यकार। सन् 1857 के इंक़लाब पर ‘दस्तंबू’ शीर्षक एक यादगार ऐतिहासिक पुस्तक लिखी। उर्दू और फ़ारसी में लिखे गए ग़ालिब के असंख्य पत्र दोनों भाषाओं के साहित्य में उत्कृष्ट दर्जा रखते हैं।

सन् 1816 में ग़ालिब के अपने हाथ लिखी हुई एक बयाज़ (जिसे ‘नुस्ख़ा-ए-भोपाल’ कहा जाता है) से पता चलता है कि ‘दीवान-ए-ग़ालिब’ (उर्दू) में संकलित अधिकतर ग़ज़लें 19 वर्ष की उम्र में लिख चुके थे। इसके बाद वो ज़्यादातर फ़ारसी में लिखते रहे।

ग़ालिब ने फ़ारसी में कुल ग्यारह मसनवियाँ लिखीं। चिराग़े-ए-दैर’ उनकी तीसरी मसनवी है। यह बनारस पर लिखी गई कविताओं में श्रेष्ठ कही जाती है। इसकी एक विशेषता यह भी है कि ईरान, अफ़गा़निस्तान और ताजुबेकिस्तानवासियों को पावन-पुनीत बनारस नगरी की अहमियत और हिन्दुस्तान की अज़मत से परिचित करानेवाली प्रथम और अप्रतिम रचना है।

निधन : 15 फरवरी, 1869

Read More
Books by this Author
New Releases
Back to Top