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Chandragupta Maurya Aur Uska Kaal-Hard Cover

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9788171780884
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प्रो. राधाकुमुद मुखर्जी की गणना देश के शीर्षस्थ इतिहासकारों में होती है और परम्परागत दृष्टि से इतिहास लिखनेवालों में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान है।

प्रस्तुत पुस्तक में प्रो. मुखर्जी के वे भाषण हैं, जो उन्होंने सर विलियम मेयर भाषणमाला के अन्तर्गत मद्रास विश्वविद्यालय में दिए थे। इन निबन्धों में भारत के प्रथम सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के जन्म तथा प्रारम्भिक जीवन और उसके विजय-अभियानों की चर्चा करते हुए उन सारे कारकों का गहराई से अध्ययन किया गया है जो एक शक्तिशाली राज्य के निर्माण में और फिर उसे स्थायित्व प्रदान करने में सहायक हुए। चन्द्रगुप्त के कुशल प्रशासन और उसकी सुविचारित आर्थिक नीतियों की परम्परा अशोक के काल तक अक्षुण्ण रहती है। आर्थिक जीवन का राज्य द्वारा नियंत्रण तथा उद्योगों का राष्ट्रीयकरण मौर्यकाल की विशेषता थी।

प्रो. मुखर्जी का यह अध्ययन चौथी शताब्दी ई.पू. की भारतीय सभ्यता के विवेचन-विश्लेषण के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसमें कौटिल्य के अर्थशास्त्र की बहुत सारी ऐसी सामग्री का समुचित उपयोग किया गया है, जिसके सम्बन्ध में या तो काफ़ी जानकारी नहीं थी या जिसकी तरफ़ काफ़ी ध्यान नहीं दिया गया था। साथ ही, शास्त्रीय रचनाओं—संस्कृत, बौद्ध एवं जैन ग्रन्थों के मूल पाठों और अशोक के शिलालेखों—जैसे विभिन्न स्रोतों से लिए गए प्रमाणों का सम्पादन और तुलनात्मक अध्ययन भी यहाँ मौजूद है। भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति के अन्वेषक विद्वानों ने इस पुस्तक को बहुत ऊँचा स्थान दिया है और यह आज तक इतिहास के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और प्राध्यापकों के लिए एक मानक ग्रन्थ के रूप में मान्य है।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 1990
Edition Year 2025, Ed. 9th
Pages 293p
Price ₹995.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1..5
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Author: Radhakumud Mukherji

राधाकुमुद मुखर्जी

प्रो. मुखर्जी का जन्म बंगाल के एक शिक्षित परिवार में हुआ। प्रेजीडेंसी कॉलेज, कोलकाता से इतिहास तथा अंग्रेज़ी में एम.ए. की डिग्री लेने के बाद उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की डिग्री प्राप्त की।

अपने शैक्षिक जीवन की शुरुआत उन्होंने अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर के रूप में की, लेकिन कुछ समय बाद ही वे इतिहास में चले गए और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्राचीन भारतीय इतिहास तथा संस्कृति के महाराजा सर मनीन्द्रचन्द्र नंदी प्रोफ़ेसर के रूप में नियुक्त हुए। इस पर वे केवल एक वर्ष रहे और उसके तुरन्त बाद मैसूर विश्वविद्यालय में इतिहास के पहले प्रोफ़ेसर नियुक्त हुए। सन् 1921 में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के इतिहास विभागाध्यक्ष का पदभार ग्रहण किया और मृत्युपर्यन्त वहीं बने रहे। सन् 1963 में 83 वर्ष की आयु में उनका देहान्त हुआ।

प्रो. राधाकुमुद मुखर्जी आजीवन प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में लगे रहे और उन्होंने प्राचीन भारत के विभिन्न पक्षों पर विस्तृत एवं आलोचनात्मक शोध-निबन्ध लिखे। अपने अनेक ग्रन्थों में उन्होंने निष्कर्षों तक पहुँचने से पहले सभी उपलब्ध स्रोतों और जानकारियों का भरपूर उपयोग किया।

प्रमुख पुस्तकें : ‘चन्द्रगुप्त मौर्य और उसका काल’, ‘अशोक’, ‘हर्ष’, ‘प्राचीन भारतीय विचार और विभूतियाँ’, ‘हिन्दू सभ्यता’, ‘प्राचीन भारत’, ‘अखंड भारत’, ‘द गुप्त एंपायर’, ‘लोकल सेल्फ़ गवर्नमेंट इन एंशिएंट इंडिया’, ‘द हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन शिपिंग एंड मैरीटाइम एक्टिविटी फ्रॉम द अर्लियस्ट टाइम्स’, ‘एंशिएंट इंडियन एजूकेशन’, ‘फ़ंडामेंटल यूनिटी ऑफ़ इंडिया’, ‘नेशनलिज्म इन हिन्दू कल्चर’, ‘ए न्यू एप्रोच टु कम्यूनल प्रॉब्लम’, ֹ‘नोट्स ऑन अर्ली इंडियन आर्ट’, ‘इंडियाज़ लैंड सिस्टम’ आदि।

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