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Bharat Ka Swarajya Aur Mahatma Gandhi-Paper Back

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रज़ा के लिए गाँधी सम्भवत: सबसे प्रेरणादायी विभूति थे। 8 वर्ष की कच्ची उम्र में मंडला में गाँधी जी को पहली बार देखने का उन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा था कि 1948 में अपने भाइयों-बहनों और पहली पत्नी के साथ पाकिस्तान नहीं गए थे और अपने वतन—भारत—में ही बने रहे। उन्होंने अपने जीवन का लगभग दो तिहाई हिस्सा फ़्रांस में बिताया, पर अपनी भारतीय नागरिकता कभी नहीं छोड़ी, न ही फ़्रेंच नागरिकता स्वीकार की। अपनी कला के अन्तिम चरण में उन्होंने गाँधी से प्रेरित चित्रों की एक शृंखला भी बनाई।

रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत हम गाँधी से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण सामग्री प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। गाँधी के 150वें वर्ष में हमारी कोशिश यह भी है कि इस पुस्तक माला में गाँधी पर और उनकी विचार-दृष्टि से प्रेरित नई सामग्री भी प्रकाशित हो। इसी सिलसिले में विचारक बनवारी द्वारा लिखित यह पुस्तक प्रकाशित हो रही है। गाँधी किसी रूढ़ि‍ से बँधे नहीं थे और उनकी अवधारणाओं और उनके आलोक में इतिहास तथा संस्कृति पर विचार भी किसी एक लीक पर नहीं चल सकता। अपने कठिन और उलझाऊ समय में हम आश्वस्त हैं कि यह पुस्तक गाँधी-विचार को नए ढंग से उद्बुद्ध करेगी। रज़ा की इच्छा थी कि गाँधी, विचार के निरन्तर विपन्न होते जा रहे परिसर में, एक महत्त्वपूर्ण और उत्तेजक उपस्थिति बने रहें।

—अशोक वाजपेयी

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Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2018
Edition Year 2022, Ed. 2nd
Pages 316p
Price ₹399.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 3
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Banwari

Author: Banwari

बनवारी

जन्म : 1947, उत्तर प्रदेश।

आप आरम्भ में दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन मेमोरियल कॉलेज में दर्शनशास्त्र का अध्यापन, फिर टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह के प्रकाशन 'दिनमान’ में संवाददाता और फिर इंडियन एक्सप्रेस समूह के दैनिक 'जनसत्ता’ में स्थानीय सम्पादक रहे। उसके बाद समाज समीक्षण केन्द्र चेन्नई से सम्बद्ध रहे।

1980 में पत्रकारिता के लिए ‘संस्कृति पुरस्कार’ से सम्मानित।

प्रकाशित प्रमुख पुस्तकें : ‘पंचवटी : भारतीय पर्यावरण परम्परा’, ‘भारतीय सभ्यता के सूत्र’, ‘महारास : प्रकृति, उत्सव और समाज’, ‘भारतीय इतिहास-दृष्टि’, ‘यूरोपीय सभ्यता का स्वरूप और उसका भविष्य’।

इन दिनों दिल्ली में रहते हैं।

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