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Astittva Ki Khoj : Bhartiya Itihas Ki Mahattvapurn Striyan-Hard Cover

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9789388183277
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स्त्रियों के योगदान का जश्न मनानेवाले पुरुष-विमर्श में आमतौर पर यह कहने का चलन रहा है कि स्त्रियाँ कोमल लताओं-सी हैं जो अपनी नाज़ुक पत्तियाँ किसी ऐसे विशाल वृक्ष के तने के गिर्द लपेटती ऊपर चढ़ती हैं, जो उनके जीवन का पुरुष हो, चाहे वह पुरुष पिता हो, पति हो या फिर मार्गदर्शक। पर हमने पाया कि इस बिम्ब के ठीक उलट, कुछ स्त्रियाँ स्वतंत्र रूप से ‘वृक्षों’ में विकसित हुईं।

इस पुस्तक की सभी स्त्रियाँ यहाँ इसीलिए मौजूद हैं। इन स्त्रियों ने कुछ ऐसा रचा-गढ़ा जो उनके बाद भी ज़िन्दा है, फिर चाहे वह रचना कोई संस्था हो, कला विधा या उसका रचना-संकलन हो, या कोई ढाँचा, कोई दर्शन, कोई तकनीक या कोई सामाजिक आन्दोलन हो। अपने जीवन के एकान्त स्थलों को छोड़ व्यापक दुनिया से जुड़ने की चेष्टा में उन्होंने तमाम विरोधों व निषेधों का सामना किया। गायिकाओं और सक्रिय कर्मियों ने मूक कर देने की धमकियों के बावजूद, नतीजों की परवाह किए बिना बेधड़क अपनी बात कही। राजनीतिज्ञों और अभिनेत्रियों ने घर के बाहर मुँह उघाड़ने पर निन्दा झेली, पर फिर भी जुटी
रहीं।

उनकी कथाओं का संकलन कर हम एक परम्परा रच रहे हैं, रिवायतें स्थापित कर रहे हैं जिनसे आज की नारियाँ प्रेरणा ले सकती हैं और अपना जीवन सुधार सकती हैं। समृद्ध वैविध्य के ताने-बानों से बुनी उनकी इन कथाओं को एक ही वृहत् पाठ के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।

—भूमिका से।

 

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2018
Edition Year 2022, Ed 2nd
Pages 320p
Price ₹895.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 2
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Author: Rekha Modi

रेखा मोदी

स्त्री-इतिहास विशेषज्ञ, सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता, कलाओं की पारखी एवं लेखिका। कार्यक्षेत्र सार्क देशों तक विस्तृत है। इनका विश्वास है कि स्त्रियों की पूर्ण भागीदारी एवं उनकी सक्रिय भूमिका समाज को सशक्त करती है।

श्रीमती मोदी का जन्म 1955 में मोदी नगर के औद्योगिक परिवार में हुआ। उनकी शिक्षा श्रमिकों के बच्चों के साथ मोदी नगर में, और आदिवासियों के बच्चों के साथ ग्वालियर में हिन्दी माध्यम से हुई थी। ज़मीन से जुड़ी होने के कारण अपनी माता श्रीमती दयावती मोदी से प्रेरित होकर उन्होंने 1984 में ‘दिव्य छाया ट्रस्ट’ की स्थापना की। यह संस्था निम्न आय वर्ग की कम्यूनिटी के साथ काम कर रही है। इनकी दूसरी संस्था ‘स्त्री-शक्ति : द पैरलल फ़ोर्स’—1998, स्त्री सशक्तीकरण को लेकर सक्रिय है जो आधुनिक युग की स्त्रियों को स्त्री के इतिहास को जानने के लिए प्रेरित करती है। इस सन्दर्भ में विदुषी विद्योत्तमा को भी प्रकाश में लाया जाएगा, जोकि सिर्फ़ कालिदास की प्रेरणा ही नही थीं, बल्कि अभिन्न रचयिता थीं।

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