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Angreji Raj Aur Hindi Ki Pratibandhit Patrakarita-Hard Cover

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9789390625505
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पेशे से प्राध्यापक संतोष भदौरिया ने ब्रिटिश काल के मीडिया पर बेहद महत्वपूर्ण अनुशीलन प्रस्तुत किया है। उनकी किताब पढ़ते हुए आज के पाठक जान सकेंगे कि पराधीन भारत में किस तरह शब्दों पर पहरे बिठा दिए जाते थे। किस तरह पत्रिकाओं को प्रतिबंधित किया जाता था और प्रतिबंधों के बावजूद किस तरह तत्कालीन पत्रकारों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष को आगे बढ़ाया और स्वाधीनता संग्राम में हिस्सेदारी के लिए आम जनता को प्रेरित किया। संतोष ने उन अखबारों-पत्रिकाओं के तेवर, रुझान और प्रतिबद्धता का गंभीर अध्ययन किया है, जिन पर ब्रिटिश शासनकाल में प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। क्या आज के नए पत्रकारों को पता है कि 1907 में इलाहाबाद से निकले 'स्वराज साप्ताहिक' के आठ- आठ संपादकों को जेल हुई। एक संपादक जेल जाता तो दूसरा संपादक आता। इसी तरह के कई तथ्यों का पता संतोष भदौरिया की किताब से चलता है। प्रकारान्तर से संतोष की किताब पराधीनता के उस काले दौर में हिंदी पत्रकारिता के संघर्ष का लेखा-जोखा भी है तो वहीं देश की आजादी की लड़ाई में प्रतिबंधित पत्र-पत्रिकाओं के अवदान को भी सामने लाती है। इन कृतियों से आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता के योगदान का भी पता चलता है।

संतोष पत्रकारिता के इतिहास के अन्यतम अध्येता और विशेषज्ञ हैं। वे विचारों से प्रगतिशील हैं। उनके साहित्य में सुसंगत इतिहास बोध और इतिहास दृष्टि है, इसी कारण वे मूल्यवान इतिहास रच सके हैं और पाठकों को भी वे अतीत में उतरने का मौका देते हैं। पत्रकारिता के इतिहास के विद्यार्थियों को संतोष से यह प्रेरणा लेनी चाहिए कि तरह-तरह की किंवदंतियों के घटाटोप को पार कर कैसे तथ्यों और प्रामाणिक सूचनाओं पर आधारित अनुशीलन किया जाता है।

- महाश्वेता देवी

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Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 194p
Price ₹600.00
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1.5
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Author: Santosh Bhadoria

संतोष भदौरिया

जन्म : 1 अगस्त 1965, बिवांर, हमीरपुर, उ.प्र. ।

शिक्षा : आठवीं तक की आरंभिक शिक्षा गांव में। स्नातक, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद। एम. ए., एम. फिल्, और पीएच. डी. की उपाधि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली।

प्रकाशित कृतियाँ: अंग्रेजी राज और प्रतिबंधित हिंदी पत्रिकाएं, शब्द-प्रतिबन्ध, बुंदेलखंड का स्वाधीनता आंदोलन और पत्र-पत्रिकाएं, हिंदी की लम्बी कविता का कद, अंग्रेजी राज, अभिव्यक्ति और बुंदेलखंड की पत्रकारिता, हिंदी भाषा: परंपरा और प्रयोग।

संपादन : केदारनाथ अग्रवाल कविता का लोक-आलोक, केदारनाथ अग्रवाल गद्य की पगडण्डियां, काव्य पुस्तिकाएं (केदारनाथ अग्रवाल): मैं बैठा हूँ केन किनारे, यहीं क्षण भर, मैंने उसको जब-जब देखा, मैं अनबजा घंटा हूँ, रेत मैं हूँ, उजले धुले दिन।

फेलोशिप : वरिष्ठ फेलोशिप, संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार, प्रथम स्वाधीनता फेलोशिप, संस्कृति विभाग, मध्य प्रदेश।

सम्मान : मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मलेन का आलोचना विधा के लिए 'वागीश्वरी पुरस्कार', हिंदी पत्रकारिता में उल्लेखनीय कार्य के लिए 'राव बहादुर बुंदेला सम्मान', प्रथम ब्रह्मस्वरूप शर्मा सम्मान।

देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं एवं समाचार-पत्रों में साहित्य, संस्कृति, पत्रकारिता और पर्यावरण के सवालों पर शोधपरक लेख, समीक्षाएँ और साक्षात्कार प्रकाशित, फिलहाल औपनिवेशिकता, प्रतिबन्ध और प्रतिरोध के प्रश्नों पर शोध एवं लेखन जारी।

संप्रति : प्रोफेसर, हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद. उ.प्र. ।

ई-मेल: [email protected]

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