Afghanistan : Kal, Aaj Aur Kal

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Afghanistan : Kal, Aaj Aur Kal

अफ़गान-संकट पर दुनिया की अनेक भाषाओं में सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं लेकिन यह ग्रन्‍थ ज़रा लीक से हटकर है। यह अफ़ग़ानिस्तान के वर्तमान संकट की जड़ों को खोजने के लिए उसके अतीत को खँगालता है और अतीत की व्याख्या उसके वर्तमान के सन्‍दर्भ में करता है। अफ़ग़ानिस्तान के अतीत और वर्तमान इस ग्रन्‍थ में सतत संगोष्ठी करते हुए दिखाई पड़ते हैं। यह ग्रन्‍थ अफ़ग़ानिस्तान का कोरा इतिहास नहीं है। उसके इतिहास, वर्तमान और भविष्य का दर्शन है। यह अफ़ग़ानिस्तान के त्रिकाल की जीवन्‍त और सरस व्याख्या है। हिन्दी में ही नहीं, दुनिया की किसी भी भाषा में समसामयिक अफ़ग़ानिस्तान पर प्रस्तुत किया जानेवाला यह सर्वप्रथम मौलिक ग्रन्‍थ है। इस ग्रन्‍थ से पाठकों को पता चलेगा कि आर्यों, बौद्धों और हिन्दुओं का यह देश कभी ‘आर्याना’ कहलाता था। पाणिनी, गांधारी और गोरखनाथ का यह देश इस्लामी कैसे बना? यह देश अब भी इस्लाम से संचालित होता है या उसके पहले से चली आ रही जातीय परम्पराओं से? अफ़ग़ानिस्तान में ऐसे कौन-से ख़ज़ाने छिपे हुए हैं, जिन्हें पाने के लिए ब्रिटिश और रूसी साम्राज्यों ने काबुल में अपने घुटने तुड़वाए और विश्व-विजेता सिकन्दर, सम्राट अशोक तथा चंगेज़ ख़ान ने हिन्दुकुश के गगनचुम्बी हिम-शिखरों को पार किया? पिछले दो सौ वर्षों में महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा ने अफ़ग़ानिस्तान में क्या-क्या विविध और विलक्षण रूप धारण किए और आगामी समय में उसका हश्र क्या हो सकता है, इसका विवेचन डॉ. वेदप्रताप वैदिक जैसे अधिकारी विद्वान से बेहतर कौन कर सकता है? रूसी और फ़ारसी भाषा के जानकार तथा कई दशकों से अफ़ग़ानिस्तान की शोध-यात्राएँ करनेवाले डॉ. वैदिक ने अफ़ग़ान राजवंशों की अन्‍दरूनी खींचतान और सत्तारूढ़ गुटों की राजनीति के अनेक अनजाने पहलुओं को भी इस ग्रन्‍थ में उजागर किया है। अफ़ग़ानिस्तान आतंकवाद का अड्डा कैसे बना और उससे मुक्त कैसे हुआ, इसका चित्रोपम वर्णन तो इस ग्रन्‍थ में है ही, भारत-पाक-अफ़ग़ान सम्‍बन्‍धों के अनेक रहस्यमय और रोचक पहलुओं पर भी प्रकाश डाला गया है। यह ग्रन्‍थ प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों, शोधकर्त्ताओं और नीति-निर्माताओं के लिए समान रूप से उपयोगी सिद्ध होगा।

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Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2002
Pages 202p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
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Vedpratap Vaidik

Author: Vedpratap Vaidik

वेदप्रताप वैदिक

हिन्‍दी जगत में कौन ऐसा है जो वेदप्रताप वैदिक को नहीं जानता। पत्रकारिता, राजनीतिक चिन्‍तन, अन्‍तरराष्ट्रीय राजनीति, हिन्‍दी के लिए अपूर्व संघर्ष, विश्व यायावरी, प्रभावशाली वक्तृत्व, संगठन-कौशल आदि अनेक क्षेत्रों में एक साथ मूर्धन्यता प्रदर्शित करनेवाले अद्वितीय व्यक्तित्व के धनी डॉ. वैदिक का जन्म 30 दिसम्‍बर, 1944 को इन्‍दौर में हुआ। वे सदा प्रथम श्रेणी के छात्र रहे। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़  इंटरनेशनल स्टडीज़ से अन्‍तरराष्ट्रीय राजनीति में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। वे भारत के ऐसे पहले विद्वान हैं जिन्होंने अपना शोध-ग्रन्‍थ हिन्दी में लिखा। उनका निष्कासन हुआ। वह राष्ट्रीय मुद्दा बना। 1965-67 में संसद हिल गई।

डॉ. राममनोहर लोहिया, मधु लिमये, आचार्य कृपलानी, इंदिरा गांधी, गुरु गोलवलकर, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर, हिरेन मुखर्जी, हेम बरुआ, भागवत झा आजाद, किशन पटनायक, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, धर्मवीर भारती, डॉ. हरिवंशराय बच्चन जैसे लोगों ने वैदिक जी का डटकर समर्थन किया। सभी दलों के समर्थन से वैदिक जी ने विजय प्राप्त की, नया इतिहास रचा। पहली बार उच्च शोध के लिए भारतीय भाषाओं के द्वार खुले।

10 वर्ष की अल्पायु में लेखन और वक्तृत्व के क्षेत्र में चमकनेवाले वैदिक जी ने अपनी पहली जेलयात्रा सिर्फ़ 13 वर्ष की आयु में की थी। हिन्‍दी सत्याग्रही के तौर पर वे 1957 में पटियाला जेल में रहे। बाद में छात्र नेता और हिन्दी आन्‍दोलनकारी के तौर पर कई जेल यात्राएँ।

अनेक राष्ट्रीय और अन्‍तरराष्ट्रीय सम्मेलनों का आयोजन। राष्ट्रीय राजनीति और भारतीय विदेश नीति के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका। कई विदेशी और भारतीय प्रधानमंत्रियों के व्यक्तिगत मित्र और अनौपचारिक सलाहकार। लगभग 80 देशों की यात्राएँ। 1999 में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व।

पिछले 55 वर्षों में हज़ारों लेख और भाषण। ‘नवभारत टाइम्स’ और ‘पीटीआई-भाषा’ के लम्‍बे समय तक सम्‍पादक रहे। कई भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्यापन। रूसी, फ़ारसी, संस्कृत आदि भाषाओं का ज्ञान। लगभग दर्जन-भर पुस्तकें प्रकाशित तथा कई राष्ट्रीय-अन्‍तरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्‍मानित।

डॉ. वैदिक की गणना उन राष्ट्रीय अग्रदूतों में होती है, जिन्होंने हिन्‍दी को मौलिक चिन्‍तन की भाषा बनाया और राष्ट्रभाषा को उसका उचित स्थान दिलवाने के लिए सतत संघर्ष और त्याग किया।

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