Sahsra Netradhari Nayak

Author: Karma Ura
Translator: Jayawanti Dimri
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Sahsra Netradhari Nayak
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अंग्रेज़ी के इस पहले भूटानी उपन्यास ‘सहस्र नेत्रधारी नायक’ (द हीरो विद ए थाउजैंड आइज़) की कहानी दूसरे भूटान नरेश के राज्यकाल के समय की है, जिसके केन्द्र में लामा से राजदरबारी बने व्यक्ति का जीवन है। साथ ही साथ लुप्तप्राय होती संस्कृति का चित्रण है, जो अब इतिहास है।

उपन्यास में कई घटनाक्रम हूबहू हैं, कहीं-कहीं लेखक कर्मा ऊरा ने कल्पनाशक्ति का इस्तेमाल किया है, जिससे उपन्यास की रोचकता और पठनीयता बढ़ गई है।

उपन्यास के नायक का जन्म भूटान के एक ग्रामीण शिंखार लामा परिवार में हुआ था किन्तु स्थितियाँ ऐसी बदलीं कि यह लामा द्वितीय भूटान नरेश के राजदरबार में परिचर नियुक्त हो गया। राजपरिवार और शासन-व्यवस्था के साथ यह साधारण नायक भूटान के बहुआयामी जीवन से पाठक का परिचय कराता है।

नायक के चालीस वर्षों के जीवनकाल की अवधि भूटान के इतिहास में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। कर-प्रणाली में सुधार, राष्ट्रीय असेम्बली की स्थापना, भूटान के संयुक्त राष्ट्र में प्रवेश के अलावा आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक जीवन में विकास—इस काल की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं। लेखक ने तत्कालीन राजदरबार के एक परिचर की दिनचर्या, दरबारी गतिविधियों, परम्पराओं, मूल्यों, धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ व्यक्तिगत प्रेम-सम्बन्धों और षड्यंत्रों का भी संवेदनशीलता के साथ चित्रण किया है। अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक उपन्यास।

 

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2009
Edition Year 2009, Ed. 1st
Pages 224p
Translator Jayawanti Dimri
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 1.5
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Karma Ura

Author: Karma Ura

कर्मा ऊरा

भूटान की मनोहारी बुमथांग घाटी के ऊरा गाँव में पैदा हुए कर्मा ऊरा की प्रारम्भिक शिक्षा बाई.एच.एस. स्कूल, थिम्पू में हुई। दिल्ली के सेंट स्टीफ़न कॉलेज में जब वह भारतीय इतिहास का अध्ययन कर रहे थे; उन्हें मैडलेन कॉलेज, ऑक्सफ़ोर्ड से राजनीतिशास्त्र, दर्शनशास्त्र, अर्थशास्त्र (पी.पी.ई.) पढ़ने के लिए जे.सी.आर. थर्ड वर्ल्ड छात्रवृत्ति मिली। तदनन्तर उन्होंने एडनबर्ग विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एम.फ़ि‍ल. की डिग्री प्राप्त की। 1989 से 1999 तक वह भूटान में योजना मंत्रालय में प्रशासनिक अधिकारी रहे। उनकी लेखकीय प्रतिभा तथा कृतित्व का सम्मान करते हुए भूटान के राजशाही सरकार ने उन्हें भूटानी अध्ययन केन्द्र का अध्यक्ष नियुक्त किया। सम्प्रति वह इसी पद पर कार्यरत हैं।

 

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