महर्षि पतंजलि भारतीय वाड़्मय के अप्रतिम प्रवक्ता थे। उन्होंने निदानसूत्रम् की रचना की तो परमार्थसारम् जैसा दार्शनिक ग्रन्थ भी रचा। संस्कृत भाषा और व्याकरण सम्बन्धी महाभाष्य लिखा तो परम्परागत योग की धारा को समेटकर उसे योगसूत्रम् के माध्यम से दार्शनिक धरातल पर भी प्रतिष्ठित किया। कहा यह भी जाता है कि उन्होंने चरक संहिता का भी संस्कार किया था। उनके जो भी ग्रन्थ ज्ञात हैं, वे अपने-अपने विषय के आधार ग्रन्थ हैं जिनकी सामग्री आगे चलकर उस विषय में मार्गदर्शक सिद्ध हुई है।

विवरणों से यह भी ज्ञात होता है कि काव्य के क्षेत्र में भी उनका अनूठा योगदान रहा। उनकी जीवन-कथा के कई रूप मिलते हैं। उनके देशकाल के विषय में सर्वाधिक उपयोगी उनका महाभाष्य ही माना गया है। इस तथा अन्य ग्रन्थों में आए तथ्यों के अनुसार कहा जा सकता है कि पतंजलि सेनापति शुंग के समकालीन रहे थे जिनके शासनकाल को इतिहासकारों ने ईसवी पूर्व 185 से 149 तक निश्चित किया है।

इस पुस्तक में उनके जीवन, समय तथा कृतित्व का परिचय देते हुए उनकी उपलब्ध रचनाओं—योगसूत्रम्’, ‘महाभाष्यम्’, ‘निदानसूत्रम् तथा परमार्थसारम् का पाठ सानुवाद दिया गया है।

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Language Hindi
Format Paper Back
Publication Year 2013
Edition Year 2013, Ed. 1st
Pages 87p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 0.5
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Author: Bhagwatilal Rajpurohit

भगवतीलाल राजपुरोहित

जन्म : 2 नवम्बर, 1943; चन्दोड़िया, धार, (मध्य प्रदेश)।

शिक्षा : हिन्दी, संस्कृत तथा प्राचीन इतिहास में एम.ए., पीएच.डी.। डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित भारतीय विद्वत्परम्परा के अनन्य साधक, सर्जक और अनुसन्धाता रहे। साहित्य, संस्कृति, हिन्दी, मालवी में सतत लेखन करते रहे।

प्रमुख कृतियाँ : भारतीय कला और संस्कृति’, ‘भारतीय अभिलेख और इतिहास’, ‘राजा भोज’, ‘भारत के प्राचीन राजवंश’ (तीन भाग)पं. विश्वेश्वरनाथ रेउकृत का सम्पादन, ‘राजा भोज का रचनाविश्व’, ‘प्रतिभा भोजराजस्य’, ‘भोजराज’, ‘कालिदास’, ‘कालिदास का वागर्थ’, ‘उज्जयिनी और महाकाल’, ‘विद्योत्तमा’ (उपन्यास);वीणावासवदत्ता’ (हिन्दी में), ‘पद्यप्राभृतक’ (हिन्दी में), ‘सेज को सरोज’ (मालवी में), ‘हलकारो बादल’ (‘मेघदूत का मालवी में) का रूपान्‍तर;मालवी लोकगीत’ (सम्पादन-अनुवाद)।

सम्‍मान : मध्य प्रदेश संस्कृत अकादमी का भोज पुरस्कार (1984, 1990), म.प्र. उच्च शिक्षा अनुदान आयोग द्वारा डॉ. राधाकृष्णन सम्मान’ (1990, 1992), म.प्र. साहित्य परिषद् का बालकृष्ण शर्मा नवीनपुरस्कार (1988) आदि।

उज्जैन के सांदीपनि महाविद्यालय के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग में आचार्य और अध्यक्ष रहे।

 

 

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