सुविख्यात पंजाबी कथाकार गुरदयाल सिंह का यह महत्त्वपूर्ण उपन्यास एक विधवा स्त्री के अनथक जीवन-संघर्ष को यथार्थवादी फलक पर उकेरता है। भारतीय समाज में सामन्ती संस्कारों का सबसे बड़ा शिकार नारी ही रही है। उसकी कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं, कोई पहचान नहीं, और अगर वह विधवा या पुनर्विवाहिता है तो न उसके जीवन में मानवीय भावनाओं का कोई स्थान है और न प्राणिक संवेदनाओं का। समाज में वह सिर्फ़ पाषाण-प्रतिमा की तरह जीवित रह सकती है अथवा ‘देवी’ की तरह मात्र पूजनीय बने रहकर। यही कारण है कि जब तक हीरा देवी समाज के इस जड़ परम्परावादी चौखटे में जड़ी रही, तब तक तो वह 'देवी' थी, पर जैसे ही उसने उसे तोड़ा, वैसे ही ‘कुलटा’ और ‘कुलबोरनी’ हो गई। इसके बावजूद, हीरा एक अपराजेय नारी-चरित्र है, और लेखक ने उसे अपनी गहरी प्रगतिशील जीवन-दृष्टि और पैने इतिहास-बोध के सहारे रचा है। हीरा देवी के अतिरिक्त केसरी, मदन मोहन और सुरेन्द्र इस कथाकृति के दूसरे ऐसे जीवन्त चरित्र हैं, जो कि हीरा के संघर्ष में प्रेरक और सहायक की भूमिका निभाते हैं।

पंजाबी से इस उपन्यास का हिन्दी अनुवाद स्वयं लेखक ने किया है, इसलिए मूल कृति का समूचा साहित्यिक और सांस्कृतिक वैभव इसमें सहज सुरक्षित है।

 

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Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 1987
Edition Year 1997
Pages 168p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 1
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Author: Gurdayal Singh

गुरदयाल सिंह

जन्म: 10 जनवरी, 1933; जैतो, ज़ि‍ला—फरीदकोट (पंजाब)।

शिक्षा : स्नातकोत्तर।

ब्रजेन्द्र कॉलेज, फरीदकोट में पंजाबी भाषा साहित्य के व्याख्याता गुरदयाल सिंह बाह्य घटनाओं के आन्तरिक अनुभव और आन्तरिक भावजगत के बाह्य अभिव्यक्तिकरण द्वारा पाठक को गहन मानवीय अनुभवों तथा भारतीय जनजीवन के विभिन्न पहलुओं को उकेरनेवाले सुविख्यात पंजाबी उपन्यासकार हैं।

प्रमुख कृतियाँ : ‘मढ़ी दा दीवा’, ‘अणहोये’, ‘कुवेला’, ‘रेते दी इक्क मुट्ठी’, ‘अध चाँदनी रात’, ‘आथण’, ‘उग्गण’, ‘अन्हें घोड़े दा दान’, ‘पहुफटाले तों पहलाँ’ (उपन्‍यास); ‘सग्गी फुल्ल’, ‘ओपरा घर’, ‘चन्न दा बूटा’, ‘कुत्ता ते आदमी’, ‘मस्ती बोता’, ‘बेगाना पिंड’, ‘रुखे मिस्से बन्दे’, ‘पक्का ठिकाना’, ‘करोर दी ढिगरी’ (कहानी-संग्रह); ‘बकलम ख़ुद’, ‘टुक खोह लये काँवाँ’, ‘बाबा खेमा’।

हिन्दी में अनूदित : ‘अध चाँदनी रात’, ‘मढ़ी दा दीवा’, ‘घर और रास्ता’, ‘पाँचवाँ पहर’, ‘परमा’ तथा ‘सब देस पराया’ (उपन्यास)।

पुरस्कार : ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार’, ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’, ‘नानकसिंह नावलिस्ट पुरस्कार’, ‘शिरोमणि साहित्यकार पुरस्कार’। इसके अलावा चार उत्तम गल्प-साहित्य की रचनाओं के लिए भाषा विभाग, पंजाब की ओर से 1966, 1967, 1968, 1972 में पुरस्‍कृत।

निधन : 16 अगस्‍त, 2016

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