Nayi Parampara Ki Khoj

Literary Criticism
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Nayi Parampara Ki Khoj

यह पुस्तक २१ वीं सदी की बदलती हुई सभ्यता , संस्कृति और प्रकृति के द्वन्द्व का आलोचनात्मक रचाव है । इस समयावधि की सामाजिक , राजनीतिक एवं सांस्कृतिक हलचल हिलोरों को जितनी प्रामाणिकता के साथ यहाँ प्रस्तुत किया गया है , वह बहुत महत्त्वपूर्ण और अलग है । इसमें जीवन, समाज, देश और प्रकृति को यथार्थवादी दृष्टि से देखती कविताओं की सूक्ष्म परख है । आज की हिन्दी कविताएँ किस तरह से अपने समय प्रदूषण का प्रतिकार करते हुए मानवता का महाआख्यान रच रही हैं इसे भी इस पुस्तक से समझा जा सकता है । इसमें उदारीकरण , निजीकरण , पूँजीवाद और बाजारवाद के छल - छद्म से बदलते समाज की स्पष्ट छवि देखी जा सकती है । यहाँ निराला , मुक्तिबोध , धूमिल , त्रिलोचन , केदारनाथ सिंह , अरुण कमल , मदन कश्यप आदि की कविताओं के साथ - साथ इक्कीसवीं सदी की दलित, स्त्री और आदिवासी हिन्दी कविता का गहन विवेचन और विश्लेषण प्रस्तुत है ।

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Language Hindi
Format Hard Back, Paper Back
Publication Year 2021
Edition Year 2021, Ed. 1st
Pages 183p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 1.5
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Editorial Review

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Shiv Kumar Yadav

Author: Shiv Kumar Yadav

शिव कुमार यादव

जन्म : 1 जुलाई , 1991 , आजमगढ़ के जगदीशपुर गाँव में : शिक्षा प्राथमिक शिक्षा बगल के कॉन्वेण्ट स्कूल से मिडिल एवं मैट्रिक आजमगढ़ के राधाकृष्ण इण्टर कॉलेज से, 2007 में इण्टरमीडिएट चिल्ड्रेन इण्टर कॉलेज , आजमगढ़ से 2010 में बी.ए. पूर्वाचल

विश्वविद्यालय जौनपुर से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय , वाराणसी से 2012 में हिन्दी से एम.ए.( नेट जेआरएफ ) एवं 2018 में वहीं से पीएच.डी. निराला के काव्य में जनतान्त्रिक मूल्य और स्वाधीनता की अवधारणा । साहित्य सेवा : जुलाई 2016 के वागर्थ पत्रिका से सक्रिय आलोचनात्मक लेखन की शुरुआत कविता में गहरी रुचि । हंस नया ज्ञानोदय , आजकल , वागर्थ , पाखी सहित अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं में आलोचनात्मक आलेख प्रकाशित कई आलेख आकाशवाणी से भी प्रसारित । फिलहाल यह आलोचना की पहली पुस्तक । सम्प्रति जुलाई 2018 से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग में असिस्टेण्ट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत ई - मेल : yadavshivkumar916@gmail.com 

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