Loknayak Samarthguru Ramdass

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Loknayak Samarthguru Ramdass

डॉ. सच्चिदानंद परळीकर ने अत्यन्त तटस्थता से और बिना किसी पूर्वग्रह के समर्थगुरु रामदास का चरित्र प्रस्तुत किया है। इसके पहले लिखी गई समर्थ रामदास की जीवनियों में उनके राजनीतिक सम्बन्धी विचारों एवं कार्य की इतने विस्तार से चर्चा नहीं की गई है। इस ग्रन्थ के सातवें अध्याय में समर्थ रामदास के समग्र काव्य का जो सरसरी निगाह से परिचय करा दिया है, वह इस ग्रन्थ की एक अनोखी विशेषता मानी जा सकती है। इसके दसवें अध्याय में समर्थ रामदास के समन्वयात्मक दृष्टिकोण की जो सोदाहरण चर्चा की गई है, उस प्रकार की चर्चा समर्थ रामदास पर लिखे गए मराठी, अंग्रेज़ी या हिन्दी के चरित्रग्रन्थों में कहीं भी नहीं की गई है। इस चर्चा को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए लेखक ने बहुत ही समीचीन सन्दर्भ प्रस्तुत किए हैं। आठवें तथा नौवें अध्याय में समर्थ रामदास के भक्तिमार्ग एवं दार्शनिक विचारों का विवेचन करते समय लेखक ने बड़ी ख़ूबी से दिखाया है कि महाराष्ट्र के अन्य सन्तों के इस विषय में सम्बन्धित विचारों में बहुतांश में मतैक्य पाया जाता है।

एक महत्‍त्‍वपूर्ण और संग्रहणीय कृति।

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Language Hindi
Format Hard Back
Edition Year 2002
Pages 247p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 2
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Sachchidanand Parlikar

Author: Sachchidanand Parlikar

सच्चिदानंद परळीकर

जन्मतिथि : 18 जनवरी, 1930

शैक्षणिक उपलब्धियाँ : एम.ए., पीएच.डी., साहित्य-रत्न

34 वर्ष पुणे के प्रसिद्ध फर्ग्युसन महाविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष, स्नातक तथा स्नातकोतर कक्षाओं के प्राचीन तथा आधुनिक हिन्दी साहित्य के अध्यापक। पीएच.डी. तथा एम.फिल. के शोधछात्रों से विविध विषयों पर शोधकार्य करवाया। महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति का संचालक-पद वर्षों तक सफलता से सँभाला और राष्ट्रभाषा के प्रचार में योगदान किया। संचालक-पद के कार्यकाल में लगभग दो लाख छात्रों को राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा की परीक्षाओं में सम्मिलित कराया। हिन्दी की आजीवन सेवा के लिए महाराष्ट्र राज्य की हिन्दी साहित्य अकादेमी के 2002 वर्ष के ‘अनन्त गोपाल शेवड़े पुरस्कार’ से गौरवान्वित। हिन्दी और मराठी में लगभग 200 के ऊपर लेख और 500 के ऊपर व्याख्यान।

प्रमुख रचनाएँ : ‘हिन्दी और मराठी के समस्यामूलक उपन्यासों का तुलनात्मक अध्ययन’, ‘बाणभट्ट की आत्मकथा : कुछ विचार एवं अन्य निबन्ध’, ‘हिन्दी के समीक्षात्मक निबन्ध’,

समर्थ रामदास के प्रति अनन्य भक्ति होने से उनकी जीवनी लिखने की प्रेरणा।

निधन : अक्‍टूबर, 2018

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