Kushal Prabandhan Ke Sootra

Author: Suresh Kant
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Kushal Prabandhan Ke Sootra

‘कुशल प्रबन्धन के सूत्र’ पर सुरेश कांत के दैनिक ‘अमर उजाला कारोबार’ में हर मंगलवार को प्रकाशित होनेवाले लोकप्रिय साप्ताहिक प्रबन्धन–कॉलम में छपे लेखों में से 40 चुने हुए लेखों का संकलन है। इन लेखों में हिन्दी में पहली बार प्रबन्धन के विभिन्न पहलुओं पर अत्यन्त रोचक और प्रभावशाली ढंग से प्रकाश डाला गया है। स्व–प्रबन्धन, कर्मचारी–प्रबन्धन, कार्यालय–प्रबन्धन, समय–प्रबन्धन, व्यक्तित्व–विकास, औद्योगिक सम्बन्ध, नेतृत्व–कला, कौशल–विकास आदि सभी पक्षों पर इनमें इतने सरल, सुबोध और आकर्षक तरीक़े से चर्चा की गई है कि पाठक लेखक के साथ बह चलता है। प्रबन्धन उसके लिए पराया अथवा दुरूह विषय नहीं रह जाता।

प्रबन्धन लेखक की नज़र में व्यक्तित्व के सतत विकास और जीवन में निरन्तर प्रगति की प्रक्रिया है। आदमी अपना ही परिष्कार न कर सके, अपने घर–परिवार की ही उन्नति न कर सके, तो वह कारोबार या दफ़्तर की प्रगति कैसे सुनिश्चित कर सकेगा? वह अपने को ही न सँभाल सके, तो दूसरों को—कर्मचारियों, ग्राहकों आदि को—क्या सँभाल सकेगा? अच्छा आदमी ही अच्छा कर्मचारी, अधिकारी या प्रबन्धक हो सकता है। अत: प्रबन्धन छात्रों, शोधार्थियों, कारोबारियों, कर्मचारियों–अधिकारियों अथवा प्रबन्धकों से ही ताल्लुक़ नहीं रखता, आम आदमी से भी ताल्लुक़ रखता है। वह कम्पनी–जगत के ही मतलब की चीज़ नहीं, मनुष्य मात्र के मतलब की चीज़ है। वह आदमी को बेहतर आदमी बनाने की कला है।

सुरेश कांत ने अपना लक्ष्य–समूह कॉरपोरेट–दुनिया के आदमी को ही नहीं, पूरी दुनिया के हर आदमी को मानकर इस विषय की प्रस्तुति की है। एक सफल, सिद्धहस्त रचनाकार होने के कारण वे इस विषय में लालित्य भरने में कामयाब रहे हैं। अपने विशद अध्ययन, गहरे ज्ञान और असरदार लेखन–शैली के बल पर वह इस विषय को हिन्दी में जन–जन में लोकप्रिय बनाने में सफल रहे हैं।

आप चाहे कोई भी हों, इस पुस्तक को पढ़ने के बाद आप वही नहीं रह जाएँगे, जो आप इसे पढ़ने से पहले थे। एक बहुत ही ज़रूरी और महत्त्वपूर्ण पुस्तक।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back, Paper Back
Publication Year 2001
Edition Year 2001, Ed. 1st
Pages 168p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1.5
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Suresh Kant

Author: Suresh Kant

सुरेश कांत

चर्चित हिन्दी-लेखक सुरेश कांत ने प्रायः सभी विधाओं में अपनी दो दर्जन से अधिक कृतियों द्वारा हिन्दी-साहित्य को एक नई ताज़गी दी है। उनकी अनेक कृतियाँ साहित्य कला परिषद (दिल्ली), हिन्दी अकादमी (दिल्ली), उ.प्र. हिन्दी संस्थान (लखनऊ) आदि द्वारा पुरस्कृत की जा चुकी हैं। उनके नुक्कड़ व्यंग्य-नाटक ‘विदेशी आया’ के 100 से भी ज्‍़यादा प्रदर्शन हो चुके हैं। दैनिक ‘अमर उजाला कारोबार’ में हर रविवार को प्रकाशित होनेवाला उनका साप्ताहिक व्यंग्य-कॉलम ‘अर्थसत्य’ और हर मंगलवार को प्रकाशित होनेवाला साप्ताहिक प्रबन्‍धन-कॉलम बहुत चर्चित हुए।

उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ इस प्रकार हैं : ‘ब से बैंक’ (पुरस्कृत), ‘अफ़सर गए विदेश’ (पुरस्कृत), ‘पड़ोसियों का दर्द’, ‘बलिहारी गुरु’ (पुरस्कृत), ‘अर्थसत्य’, ‘जॉब बची सो…’ (व्‍यंग्‍य उपन्‍यास); उपन्यास—‘धम्मं शरणम्’ (पुरस्कृत), ‘युद्ध’, ‘जीनियस’, ‘नवाब साहब’, ‘कनीज’ (उपन्‍यास) ; ‘उत्तराधिकारी’, ‘गिद्ध’, ‘क्या आप एस.पी. दीक्षित को जानते हैं?’ (कहानी-संग्रह); ‘रजिया’, ‘प्रतिशोध’, ‘विदेशी आया’, ‘गवाही’, ‘कौन?’ (नाटक); ‘अफ़सर गए बिदेस’, ‘पड़ोसियों का दर्द’, ‘बलिहारी गुरु’, ‘देसी मैनेजमेंट’, ‘चुनाव मैदान में बन्दूकसिंह’, ‘भाषण बाबू’, ‘मुल्ला तीन प्याजा’, ‘कुछ अलग’, ‘बॉस, तुसी ग्रेट हो!’ (व्‍यंग्‍य); ‘कुट्टी’, ‘रोटी कौन खाएगा’, ‘चलो चाँद पर घूमें’, ‘भाषण बाबू’, ‘भैंस का अंडा’, ‘विश्वप्रसिद्ध बाल कहानियाँ’ (पाँच भाग) (बाल-साहित्‍य); ‘हिन्दी गद्य लेखन में व्यंग्य और विचार’ (आलोचना); ‘प्रबन्धन के गुरुमंत्र’, ‘कुशल प्रबन्‍धन के सूत्र’, ‘सफल प्रबन्‍धन के गुर’, ‘उत्‍कृष्‍ट प्रबन्‍धन के रूप’, ‘आदर्श प्रबन्‍धन के सूक्‍त’, ‘बैंकों में हिन्दी का प्रयोग’ आदि (प्रबन्‍धन) आदि।

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