Kavita Mein Banaras

Poetry
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ग़ालिब उसे हिन्दुस्तान का क़ाबा कहते हैं, तो कबीर कहते हैं, ‘चोवा चंदन अगर पान, घर घर सुमृति होत पुरान’, तुलसी के लिए वह ‘परमारथ की खान’ है। भारतेन्दु के लिए वहाँ के ‘लोग निकम्मे भंगी गंजड़, लुच्चे बे-बिसवासी’ हैं तो बेढब बनारसी कहते हैं कि बनारस की कोई शान ही नहीं रह जाएगी जिस दिन गलियों में पान की दुकानें नहीं दिखेंगी। श्रीकान्त वर्मा की काशी में ‘जिस रास्ते जाते हैं शिव, उसी रास्ते आता है शव’, तो वली दकनी का दिल जोगी बनकर इसी बनारस में वास करना चाहता है।

यह काशी है, वाराणसी, बनारस जिसे दुनिया के प्राचीनतम नगरों में गिना जाता है। यह अपनी विलक्षणताओं से हर किसी को आकर्षित करता है। भौतिक सुखों से उकताए यूरोप-अमेरिकावासियों से लेकर मोक्ष और अध्यात्म को जीवन का लक्ष्य मानने वाले अनपढ़ ग्रामीण भारतीयों तक। 

कवि, लेखक, कलाकार, फ़िल्मकार भी उसके लगभग रहस्यमय आकर्षण में बिंधे उसकी तरफ़ खिंचे चले जाते हैं। संसार में बहुत ही कम ऐसे शहर होंगे जो कविताओं, फ़िल्मों और कलाओं में एक मिथक की तरह बार-बार आते रहते हैं। वे सिर्फ़ शहर नहीं होते, मानव की वृहत् इतिहास यात्रा के पड़ाव होते हैं। बनारस भी उन्हीं में से एक है जिसकी साक्षी है यह पुस्तक।

इसमें उन कविताओं को इकट्ठा किया गया है, जो अलग-अलग भाषाओं के कवियों ने अपने-अपने समय के बनारस को देख और जी कर लिखीं। लगभग छह सौ साल का विराट समय-पट्ट और उस पर अंकित ये कविताएँ!

इन कविताओं से गुज़रना बनारस के इतिहास और संस्कृति के साथ-साथ उसके अव्याख्येय और कालातीत  सौन्दर्य से साक्षात्कार करना भी है। कबीर, रैदास, भारतेन्दु, प्रसाद, शमशेर, त्रिलोचन, श्रीकान्त वर्मा, केदारनाथ सिंह, राजेश जोशी, ज्ञानेन्द्रपति, अष्टभुजा शुक्ल और व्योमेश शुक्ल सहित उनतालीस हिन्दी कवियों और वली दकनी, ग़ालिब, अकबर इलाहाबादी और नज़ीर बनारसी सहित पन्द्रह उर्दू शायरों के साथ बांग्ला के राजा जयनारायण घोषाल, शंखघोष और विश्वप्रसिद्ध स्पेनिश कवि होर्हे लुईस बोर्हेस की कविताएँ इसमें शामिल हैं। कहने की ज़रूरत नहीं कि बनारस-प्रेमी पाठकों के लिए यह एक दस्तावेज़ी और संग्रहणीय पुस्तक है।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back, Paper Back
Publication Year 2022
Edition Year 2022, Ed. 1st
Pages 216p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 2
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Editorial Review

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Author: Rajeev Singh

राजीव सिंह

राजीव सिंह का जन्म 01 नवम्बर, 1956 को बनारस, उत्तर प्रदेश में हुआ। बनारसी गँवईपन के बीच उनका बचपन बीता। शहर के मंदिरों, गंगा, घाटों को निहारते, पक्का महाल की गलियों में घूमते और बनारस के ताने-बाने को समझते हुए बड़े हुए। भारतीय संस्कृति, साहित्य, संगीत, कला, हिन्दू धर्म और उसके पोंगापंथ की समझ भी वहीं विकसित हुई। कबीर और तुलसी के राम के अन्तर को वहीं समझा। गंगा-जमुनी संस्कृति को देखा। वामपंथी, दक्षिणपंथी और समाजवादी विचारधारा की समझ भी बनारस में ही बनी।

उन्होंने बी.एच.यू. से हिन्दी में पी-एच.डी. की। शुरू में अख़बारों में शौक़िया लेखन किया लेकिन आगे चलकर पत्रकारिता उनका पेशा बना। बनारस में रहते हुए वहाँ के चार अख़बारों से क़रीब बीस साल तक जुड़े रहे। ‘दैनिक आज’ के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकुमार की याद में बनारस में ‘चंद्रकुमार मीडिया फ़ाउंडेशन’ की स्थापना की जिसके तहत ग्रामीण पत्रकारों के लिए सालाना जलसे का लम्बे समय तक आयोजन किया। 

बाद में दिल्ली रहने लगे। दिल्ली ने पेशा बदल दिया। लगभग 15 वर्षों तक जनसंचार संस्थानों में प्राध्यापन किया। फ़िलहाल दिल्ली ही ठिकाना है।

तीन पुस्तकें प्रकाशित हैं—प्रगतिशील आलोचना की परम्परा’, ‘डॉ. रामविलास शर्मा’ और ‘कविता में बनारस’।

ईमेल : rajeevpratapvns@gmail.com

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