Goongi Rulaai Ka Chorus

Fiction : Novel
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Goongi Rulaai Ka Chorus
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भारतीय जन-जीवन का एक लम्बा दौर ऐसा भी रहा जिसमें हिन्दू और मुस्लिम धर्मों के अति-साधारण लोग बिना किसी वैचारिक आग्रह या सचेत प्रयास के, जीवन की सहज धारा में रहते-बहते एक साझा सांस्कृतिक इकाई के रूप में विकसित हो रहे थे। एक साझा समाज का निर्माण कर रहे थे, जो अगर विभाजन-प्रेमी ताकतें बीच में न खड़ीं होतीं तो एक विशिष्ट समाज-रचना के रूप में विश्व के सामने आता। हमारे गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों में आज भी इसके अवशेष मिल जाते हैं। परम्परा का एक बड़ा हिस्सा तो उसके ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में हमारे पास है ही। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत भी उसी विरासत का हिस्सा है जो इस उपन्यास के केंद्र में है। खिलजी शासनकाल में देवगिरी के महान गायक गोपाल नायक और अमीर खुसरो के मेल से जिस संगीत की धारा प्रवाहित हुई, अकबर, मुहम्मद शाह रंगीले और वाजिद अली शाह के दरबारों से बहती हुई वह संगीत के अलग-अलग घरानों तक पहुँची। मैहर के बड़ो बाबा अलाउद्दीन खान की तरह इस उपन्यास के बड़ो नानू उस्ताद मह्ताबुद्दीन खान के यहाँ भी संगीत ही इबादत है। इसीलिए उत्तर प्रदेश के खुर्शीद जोगी और बंगाल के बाउल परम्परा के कमोल उनके घर से दामाद के रूप में जुड़े। लेकिन इक्कीसवीं सदी के भारत में विभाजन-प्रेम एक नशे के तौर पर उभर कर आता है। गुजरात में सदी के शुरू में जो हुआ वह अब यहाँ की सामाजिक-सांस्कृतिक मुख्यधारा का सबसे तेज़ रंग है। इस जहरीले परिवेश में नानू अयूब खान, अब्बू खुर्शीद जोगी, बाबा मदन बाउल और अंत में कमोल कबीर एक-एक कर खत्म कर दिए जाते हैं। बच जाती है एक रुलाई जो खुलकर फूट भी नहीं पाती। हलक तक आकर रह जाती है। यह उपन्यास इसी रुलाई का कोरस है। विभाजन को अपना पवित्रतम ध्येय मानने वाली वर्चस्वशाली विचारधारा के खोखलेपन और उसकी रक्त-रंजित आक्रामकता को रेखांकित करते हुए यह उपन्यास भारतीय संस्कृति के समावेशी चरित्र को हिन्दुस्तानी संगीत की लय-ताल के साथ पुनः स्थापित करने का प्रयास करता है।

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Language Hindi
Format Paper Back
Publication Year 2021
Edition Year 2021, Ed. 1st
Pages 232p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 1.5
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Editorial Review

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Ranendra

Author: Ranendra

रणेन्द्र

रणेन्द्र का जन्म 4 मार्च 1960 को बिहार के नालन्दा जिले के सोहसराय में हुआ।

प्रशासनिक सेवा से सम्बद्ध रहे रणेन्द्र की प्रकाशित कृतियाँ है : ग्लोबल गाँव के देवता, गायब होता देश, गूँगी रूलाई का कोरस (उपन्यास), रात बाकी एवं अन्य कहानियाँ, छप्पन छुरी बहत्तर पेंच (कहानी-संग्रह) और थोड़ा-सा स्त्री होना चाहता हूँ (‌कविता संग्रह)। इन्होंने ‘झारखण्ड एन्साइक्लोपीडिया’ और ‘पंचायती राज : हाशिये से हुकूमत तक’ का सम्पादन भी किया है।

इनकी अनेक रचनाएँ कई भाषाओं में अनूदित  हो चुकी हैं। ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘लॉड् र्स ऑफ ग्लोबल विलेज’ नाम से प्रकाशित हो चुका है।

इन्हें श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको सम्मान, प्रथम विमलादेवी स्मृति सम्मान, वनमाली कथा सम्मान,  बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान, जे.सी. जोशी स्मृति जनप्रिय लेखक सम्मान कई और अनेक सम्मानों से सम्मानित किए जा चुका है।

सम्प्रति : डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, झारखंड सरकार के निदेशक हैं।

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