Dharti Ki Pukar

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Dharti Ki Pukar
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विकास बनाम पर्यावरण इस सदी की सबसे बड़ी बहसों में से एक है। आज जबकि पूरी दुनिया में पर्यावरण-चेतना फैल रही है और विकास की लगभग हर गतिविधि के लिए पर्यावरणीय मानदंड निर्धारित किए जा रहे हैं, फिर भी विकासवादी निरन्तर इस कोशिश में रहते हैं कि पर्यावरणीय ख़तरों की अनदेखी करके भी किस तरह कोई बड़ा बाँध, कोई बड़ी परियोजना शुरू की जाए। इसलिए जब सुन्दरलाल बहुगुणा दुनिया के अन्य पर्यावरणविदों के साथ सुर मिलाकर यह कहते हैं कि तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ गया है और वह तथाकथित विकासवादियों द्वारा प्रकृति के विरुद्ध छेड़ा गया है, तो वे ग़लत नहीं होते।

वे कहते हैं, ‘‘प्रश्न केवल विकास के विरोध का नहीं है, ज़िन्दा रहने के अधिकार की रक्षा का है। जिन परियोजनाओं को सरकारी मीडिया और शासन व अर्थनीति पर हावी आभिजात्य वर्ग देश के त्वरित विकास के लिए अनिवार्य मानता है, उन परियोजनाओं के औचित्य को चुनौती देनेवालों को विदेशी एजेंट, देशद्रोही और विकास के दुश्मन के रूप में प्रचारित किया जाता है।’’

सुन्दरलाल बहुगुणा भी इस दृष्टि से बौद्धिक समाज में नायक और खलनायक दोनों हैं। लेकिन हिमालय, गंगा, जंगल और टिहरी बाँध को लेकर जो सवाल बहुगुणा ने खड़े किए हैं और सरकार की प्रकृति-विरोधी नीतियों का पर्दाफ़ाश किया है, उसमें शायद ही किसी को आपत्ति हो। साथ ही उन्होंने विकास की जो वैकल्पिक दृष्टि दी है, उससे भी किसी को परहेज़ नहीं होगा।

यह पुस्तक ‘धरती की पुकार’ बहुगुणा जी के चिन्तन का सार है। इसमें ‘चिपको आन्दोलन’ से लेकर टिहरी बाँध के विरोध में उनके लम्बे उपवासों तक की चिन्तनभूमि के दर्शन होते हैं। आशा है, यह पुस्तक विकास और पर्यावरण के रिश्तों को सही परिप्रेक्ष्य में देखने-समझने में मदद करेगी।

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Language Hindi
Format Hard Back
Edition Year 2019, Ed. 5th
Pages 111p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Radhakrishna Prakashan
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Editorial Review

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Sundarlal Bahuguna

Author: Sundarlal Bahuguna

सुन्दरलाल बहुगुणा

 

सुन्दरलाल बहुगुणा कैसे टिहरी रियासत में एक मुलाजिम होते-होते रह गए और कैसे गांधी जी के ‘अहिंसा आन्दोलन’ में कूद पड़े, इसकी भी एक दास्तान है। टिहरी के महान क्रान्तिकारी श्रीदेव सुमन ने उनसे पूछा कि ‘पढ़ाई के बाद क्या करोगे?’ 13 साल के सुन्दरलाल ने कहा, ‘रियासत की सेवा।’ एक ग़रीब की तरफ़ अँगुली करके सुमन ने कहा, ‘तब इस जनता की सेवा कौन करेगा?’ इसी सवाल ने उन्हें अपना रास्ता बदलने को मजबूर किया।

1 जनवरी, 1927 को गाँव—मरोड़ा, ज़िला—टिहरी गढ़वाल में जन्मे सुंदरलाल बहुगुणा ने आरम्भिक शिक्षा गाँव और उत्तरकाशी में पाई। बाद में उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय, लाहौर से बी.ए. किया। उन्होंने अछूतोद्धार, पर्यावरण, खादी और चिपको आन्दोलनों में सक्रिय हिस्सेदारी की। वे अनेक बार जेल गए। पर्यावरण-रक्षा के मुद्दों को लेकर उन्होंने पूरे हिमालय की पैदल यात्रा की और ‘चिपको आन्दोलन’ को विश्वव्यापी प्रसिद्धि दिलाई।

आज वे टिहरी बाँध के ख़िलाफ़ अपने ऐतिहासिक अनशन के लिए चर्चित हैं, लेकिन आनेवाली पीढ़ियाँ उन्हें भारत में पर्यावरण की अलख जगाए रखने के लिए याद रखेंगी।

निधन : 21 मई 2021

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