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Bhartrihari : Kaya Ke Van Mein

Author: Mahesh Katare
Edition: 2019, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Bhartrihari : Kaya Ke Van Mein

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राजा भर्तृहरि, प्रेमी भर्तृहरि, कवि भर्तृहरि, वैयाकरण भर्तृहरि और योगी भर्तृहरि। उनके आयाम, समय और देश का अपार विस्तार। भर्तृहरि के जीवन में एक ओर प्रेम और कामिनियों के आकर्षण हैं तो दूसरी ओर वैराग्य का शान्ति-संघर्ष। वह संसार से बार-बार भागते हैं, बार-बार लौटते हैं। इसी के साथ उनके समय की सामाजिक, धार्मिक उथल-पुथल भी जुड़ी है।

भर्तृहरि का द्वन्द्व सीधे गृहस्थ व वैराग्य का न होकर तिर्यक है। विशेष है। वह इसलिए कि वे कवि हैं, वैयाकरण भी। सुकवि अनेक होते हैं तथा विद्वान भी लेकिन भर्तृहरि जैसे सुकवि और विद्वान एक साथ बिरले ही होते हैं।

सुपरिचित कथाकार महेश कटारे का यह उपन्यास इन्हीं भर्तृहरि के जीवन पर केन्द्रित है। इस व्यक्तित्व को, जिसके साथ असंख्य किंवदन्तियाँ भी जुड़ी हैं, उपन्यास में समेटना आसान काम नहीं था, लेकिन लेखक ने अपनी सामर्थ्य-भर इस कथा को प्रामाणिक और विश्वसनीय बनाने का प्रयास किया है। भर्तृहरि के निज के अलावा उन्होंने इसमें तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों का भी अन्वेषण किया है। उपन्यास के पाठ से गुज़रते हुए हम एक बार उसी समय में पहुँच जाते हैं।

भर्तृहरि के साथ दो बातें और जुड़ी हुई हैं—जादू और तंत्र-साधना। लेखक के शब्दों में, ‘मेरा चित्त अस्थिर था, कथा के प्रति आकर्षण बढ़ता और भय भी, कि ये तंत्र-मंत्र, जादू-टोने कैसे समेटे जाएँगे? भाषा भी बहुत बड़ी समस्या थी कि वह ऐसी हो जिसमें उस समय की ध्वनि हो।’ इतनी सजगता के साथ रचा गया यह उपन्यास पाठकों को कथा के आनन्द के साथ इतिहास का सन्तोष भी देगा।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2019
Edition Year 2019, Ed. 1st
Pages 366p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22.5 X 14.5 X 3
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Mahesh Katare

Author: Mahesh Katare

महेश कटारे

महेश कटारे का जन्म 14 दिसम्बर, 1946 को बिल्हैटी, ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में हुआ। आजीविका के लिए खेती की, फिर कुछ साल स्कूल में पढ़ाया।

उनकी प्रकाशित रचनाएँ हैं—‘कामिनी काय कान्तारे’ (दो खंड), ‘भर्तृहरि : काया के वन में’ (‘कामिनी काय कान्तारे’ का नया रूप), ‘भवभूति कथा’, ‘कालीधार’ (उपन्यास); ‘समर शेष है’, ‘इतिकथा अथकथा’, ‘मुर्दा स्थगित’, ‘पहरुआ’, ‘छछिया भर छाछ’, ‘सात पान की हमेल’, ‘देहात’, ‘फागुन की मौत’, ‘मेरी प्रिय कथाएँ’, ‘ग़ौरतलब कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह); ‘महासमर

का साक्षी’, ‘अँधेरे युगांत के’, ‘विभाजन’ (कथानाट्य); ‘हे राम’, ‘गाँव-गाथा’ (नाटक); ‘पहियों पर रात-दिन’, ‘देस बिदेस दरवेश’

(यात्रा-वृत्तान्त); ‘नज़र इधर-उधर’, ‘समय के साथ-साथ’ (अन्य)। उन्होंने ‘वसुधा’ पत्र‌िका के कहानी विशेषांक का सम्पादन भी किया है। उनकी कहानी ‘पहियों पर चढ़े सुख’ पर लघु फ़िल्म बनी और इसका नाट्य मंचन हुआ है। विभिन्न भारतीय भाषाओं में उनकी रचनाओं के अनुवाद और मंचन हुए हैं।

उन्हें ‘वागीश्वरी सम्मान’, म. प्र. साहित्य परिषद/म. प्र. साहित्य अकादमी के ‘कथा पुरस्कार’, ‘प्रेमचन्द कथा पुरस्कार’, ‘शमशेर सम्मान’, ‘कथाक्रम सम्मान’, ‘राष्ट्रभाषा परिषद बिहार सम्मान’, ‘ढींगरा फ़ाउंडेशन कथा-सम्मान’, ‘कुसुमांजलि सम्मान’, ‘श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको सम्मान’, ‘स्पंदन कथा शिखर सम्मान’ और ‘रज़ा फ़ाउंडेशन फ़ेलोशिप’ सहित कई पुरस्कार और सम्मान प्रदान किये जा चुके हैं।

ई-मेल : [email protected] 

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