Uttal Umang

Author: Prahlad Agarwal
As low as ₹191.75 Regular Price ₹295.00
You Save 35%
In stock
Only %1 left
SKU
Uttal Umang
- +

सुभाष घई पिछले लगभग पाँच दशकों से सृजनरत हैं। एक नाचीज़ से शुरू हुई उनकी रचना-यात्रा शिखर-सन्धान करते हुए आज भी जारी है। ‘कालीचरण’ की शुरुआत का अनजाना व्यक्तित्व हिन्दी सिनेमा में एक प्रतिमान की तरह स्थापित हो चुका है। इस तरह कि उसकी कठोरतम आलोचना भी की जा सकती है लेकिन उपेक्षा नहीं।

आज सुभाष घई एक विशाल कॉरपोरेट साम्राज्य के शीर्षपुरुष हैं। उनकी निर्माण संस्था के अन्तर्गत अनेक फ़िल्मकार फ़िल्में बना रहे हैं। फ़िल्म निर्माण से सम्बन्धित अनेक उपक्रमों के वे मालिक हैं। उन्होंने अपनी पिछली कई फ़िल्में ख़ुद ही प्रदर्शित की हैं और अब वितरण व्यवसाय में भी प्रवेश कर चुके हैं। उनका इरादा फ़िल्म निर्माण से सम्बन्धित प्रशिक्षण देनेवाला एक विराट संस्थान भी आरम्भ करने का है, कहा जाता है कि उसकी सारी तैयारियाँ पूरी कर ली गई हैं। पर हमारे लिए या कहना चाहिए कि सिनेमा के आशिकों के लिए सबसे बढ़कर महत्त्व का उनका फ़िल्मकार व्यक्तित्व है जिसने उन्हें लाखों दिलों की चाहतों में शामिल किया है।

हमारी यह किताब सुभाष घई के फ़िल्मकार व्यक्तित्व से ही मुख़ातिब है जिसका हमसे लगातार प्रगाढ़ सम्बन्ध बनता चला गया। कई जानकारियों से अवगत कराती एक बेहद महत्त्वपूर्ण कृति।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2007
Edition Year 2007, Ed 1st
Pages 179p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1.5
Write Your Own Review
You're reviewing:Uttal Umang
Your Rating
Prahlad Agarwal

Author: Prahlad Agarwal

प्रह्लाद अग्रवाल

यायावर, आवारा मिज़ाज। संगीत, साहित्य और सिनेमा से गहरी आशिक़ी। पिछले तीन दशकों में बहुआयामी लेखन। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर प्रकाशन।

प्रकाशित पुस्तकें : ‘हिन्दी कहानी : सातवाँ दशक’ (आलोचना); ‘तानाशाह’ (उपन्यास); ‘राजकपूर : आधी हक़ीक़त आधा फ़साना’, ‘प्यासा : चिर अतृप्त गुरुदत्त’, ‘कवि शैलेन्द्र : ज़िन्दगी की जीत में यक़ीन’, ‘उत्ताल उमंग : सुभाष घई की फ़िल्मकला’, ‘बाज़ार के बाजीगर : इक्कीसवीं सदी का सिनेमा’, ‘ओ रे माँझी... : बिमलराय का सिनेमा’, ‘जुग-जुग जिए मुन्नाभाई : छवियों का मायाजाल’, ‘रेशमी ख़्वाबों की धूप-छाँव : यश चोपड़ा का सिनेमा’, ‘महाबाज़ार के महानायक’ (कविता/सिनेमा)।

‘प्रगतिशील वसुधा’ के बहुचर्चित फ़िल्म विशेषांक ‘हिन्दी सिनेमा : बीसवीं से इक्कीसवीं सदी तक’ का सम्पादन एवं कई पुस्तकों के सहयोगी लेखक।

शासकीय स्वशासी महाविद्यालय में प्राध्यापक-पद से सेवानिवृत्त।

Read More
Books by this Author
New Releases
Back to Top