Soordas 'Harbans Lal Sharma'

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Soordas 'Harbans Lal Sharma'

यदि युग-सापेक्ष दृष्टि से तात्कालिक समाज को केन्द्र-बिन्दु बनाकर सूर-साहित्य का आकलन किया जाए तो स्पष्ट लक्षित होगा कि सूर ने बाह्य प्रपंच से मुक्त होकर अन्तर्लीन दशा में काव्य-सृष्टि की थी, किन्तु इसका यह अर्थ न समझ लिया जाए कि युग की सापेक्षता से सूर और उनका साहित्य सर्वथा बचा रहा। सूर ने भक्ति को माधुर्य-मंडित करके प्रस्तुत करने का ध्येय बनाया हुआ था। यही उस युग की सबसे बड़ी माँग थी।

चैतन्य के शिष्य रूप और सनातन गोस्वामी ने शास्त्रीय मर्यादा में देववाणी द्वारा भक्ति का माधुर्य पक्ष स्थिर किया था; किन्तु जनमानस से उसका सीधा लगाव न उस युग में हुआ और न बाद में ही वह सम्भव हो सका।

हिन्दी के आधिकारिक विद्वानों और आचार्यों ने समय-समय पर सूरदास के साहित्य और उनके साहित्येतर पहलुओं पर जो चिन्तन-मनन किया है, उसका एक प्रतिनिधि संकलन यहाँ पुस्तक के रूप में प्रस्तुत है। सूर-साहित्य के जिज्ञासुओं, पाठकों और हिन्दी साहित्य के सभी छात्रों के लिए विचार-कोश की एक महत्‍त्‍वपूर्ण भूमिका निभानेवाली पुस्‍तक।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 1966
Edition Year 2021, Ed. 14th
Pages 235p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 2
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Editorial Review

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Author: Harbans Lal Sharma

हरबंशलाल शर्मा

जन्म : 1915 ई. में मेरठ, उत्तर प्रदेश।

शिक्षा : एम.ए., पी-एच.डी., डी.लिट्.।

अलीगढ़ विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रहे। सूर-साहित्य के विशेषज्ञ।

प्रमुख कृतियाँ : ‘सूर और उनका साहित्य’, ‘सूर समीक्षा’, ‘सूरदास’।

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