Sampradayik Dange Aur Bhartiya Police

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Sampradayik Dange Aur Bhartiya Police
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साम्प्रदायिक दंगों को प्रशासन की एक बड़ी असफलता के रूप में लिया जाना चाहिए। हाल के वर्षों में इस विषय पर एक व्यापक समझ तैयार करने में पूर्व पुलिस अधिकारी व प्रतिष्ठित लेखक विभूति नारायण राय का यह अध्ययन बहुत महत्त्वपूर्ण है। श्री राय ने यह अध्ययन नेशनल पुलिस अकादमी, हैदराबाद के लिए एक वर्ष के गहन परिश्रम के बाद पूरा किया था। दुर्भाग्य से, इसकी कुछ स्थापनाओं को छिपाने–दबाने की कोशिश भी की गई। इसको प्रकाश में लाने का श्रेय नेशनल अकेडमी ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन, मसूरी को जाता है, जिसने इसे सबसे पहले प्रकाशित किया। मेरी राय है कि प्रशासन और पुलिस के तमाम अधिकारियों के लिए इस पुस्तक का पठन–पाठन अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए।

—पदम रोशा, पुलिस महानिदेशक (सेवानिवृत्त)

साम्प्रदायिक दंगों के दौरान पुलिस–व्यवहार पर यह एक ठोस, विश्वसनीय और आधिकारिक अध्ययन है–––लेखक का यह कहना एकदम सही है कि पुलिस में काम करनेवाले लोग उसी समाज से आते हैं जिसमें साम्प्रदायिकता के विषाणु पनपते हैं, उनमें वे सब पूर्वग्रह, घृणा, सन्देह और भय होते हैं जो उनका समुदाय किसी दूसरे समुदाय के प्रति रखता है। पुलिस में भर्ती होने के बावजूद वे ख़ुद को अपने ‘सहधार्मिकों’ के ‘हम’ में शामिल रखते हैं और दूसरे समुदाय को ‘वे’ मानते रहते हैं।

—ए.जी. नूरानी (‘फ़्रंटलाइन’ में)

गृह मंत्रालय और पुलिस ब्यूरो ऑफ़ रिसर्च एंड डेवलपमेंट तथा अपने सर्वेक्षण से प्राप्त आँकड़ों के विस्तृत विश्लेषण पर आधारित यह शोध बताता है कि प्रत्येक दंगे के 80 प्रतिशत शिकार मुस्लिम होते हैं और जो लोग गिरफ़्तार किए जाते हैं, उनमें भी लगभग 90 प्रतिशत अल्पसंख्यक ही होते हैं। श्री राय के अनुसार, ‘‘यह तर्क–विरुद्ध है। अगर 80 प्रतिशत शिकार मुस्लिम हैं तो होना यह चाहिए कि गिरफ़्तार लोगों में 70 प्रतिशत हिन्दू हों। लेकिन ऐसा कभी होता नहीं है।’’

—सिबल चटर्जी (‘आउटलुक’ में)

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Language Hindi
Format Hard Back, Paper Back
Edition Year 2016, Ed. 4th
Pages 126p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Radhakrishna Prakashan
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Editorial Review

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Vibhuti Narayan Rai

Author: Vibhuti Narayan Rai

विभूति नारायण राय

मूलत: उपन्यासकार विभूति नारायण राय का जन्म 28 नवम्बर, 1950 को हुआ। अब तक आपके पाँच उपन्यास प्रकाशित— ‘घर’, ‘शहर में कर्फ़्यू’, ‘क़िस्सा लोकतंत्र’, ‘तबादला’ तथा ‘प्रेम की भूतकथा’। ‘घर’ बांग्ला, उर्दू तथा पंजाबी; ‘शहर में कर्फ़्यू’ उर्दू, अँग्रेज़ी, पंजाबी, बांग्ला, मराठी, कन्नड़, मलयालम, असमिया, उड़िया, तेलगू तथा तमिल; ‘क़िस्सा लोकतंत्र’ पंजाबी तथा मराठी; ‘तबादला’ उर्दू तथा अंग्रेज़ी और ‘प्रेम की भूतकथा’ उर्दू, मराठी, पंजाबी, कन्नड़ तथा अंग्रेज़ी में अनूदित और प्रकाशित।

‘क़िस्सा लोकतंत्र’, ‘उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान’ द्वारा सम्मानित। ‘तबादला’ कथा यू.के. द्वारा 'इन्दु शर्मा कथा सम्मान' से सम्मानित।

भारतीय समाज में व्याप्त साम्प्रदायिकता को समझने के क्रम में ‘साम्प्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस’ तथा ‘हाशिमपुरा 22 मई’ नामक दो महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन। इन दोनों पुस्तकों का अंग्रेज़ी, उर्दू, कन्नड़, मराठी, तेलगू तथा तमिल में अनुवाद।

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए व्यंग्य-लेखन जो संग्रह के रूप में ‘एक छात्र नेता का रोज़नामचा’ नाम से प्रकाशित। लेखों के तीन संग्रह ‘रणभूमि में भाषा’, ‘फ़ेंस के उस पार’, ‘किसे चाहिए सभ्य पुलिस’ प्रकाशित। कई पत्र-पत्रिकाओं में स्तम्भ-लेखन। लगभग दो दशकों तक हिन्दी की महत्त्वपूर्ण मासिक पत्रिका ‘वर्तमान साहित्य’ का सम्पादन।

पुलिस में लम्बी नौकरी के बाद आप पाँच वर्षों तक ‘महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा’ के कुलपति भी रहे।

 

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