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Rashtrakavi Kuwempu Ki Kavitayen

Author: Kuvenpu
Translator: Tippeswamy 'Puneet'
Editor: Tippeswami
Edition: 2006, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Lokbharti Prakashan
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Rashtrakavi Kuwempu Ki Kavitayen

‘ओ मेरे चेतन, बन तू अनिकेतन', कहकर सारे जहाँ में कहीं भी निकेतनिवासी बनने की इच्छा न रखनेवाले कुवेंपु ने अपने विश्वमानव सन्देश के द्वारा मनुष्य को जाति, वर्ण और अन्यान्य उपाधि-विशेषणों से बाहर आकर मात्र मनुष्य की हैसियत से ‘जीने और जीने दो’ के सिद्धान्त पर डटे रहने को कहा है। उनके पंचमंत्रों और सप्तसूत्रों में विश्व मानव की परिकल्पना है।

कुवेंपु के जीवन में आध्यात्मिकता का पुट उनके बचपन के दिनों से विकसित होता गया। उनके ‘दर्शन’ के मूल में प्रकृति का महत्त्वपूर्ण योगदान है, प्रकृति उनके काव्य का अविभाज्य अंग है। उनके काव्य में अभिव्यक्त आध्यात्मिकता ने उनके अध्ययन-चिन्तन-मन्थन एवं अनुभव से उद्भूत होकर धीरे-धीरे साकार रूप प्राप्त किया है। यह आध्यात्मिकता उनके लिए बाहरी वेश न होकर अन्तरंग विकास के अविभाज्य अंग के रूप में है। मतलब यह कि कुवेंपु में जो आध्यात्मिकता पाई जाती है, उसके लिए उस परिवेश का भी योगदान है, जिसके अन्तर्गत वे पाले-पोसे गए थे।

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Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Tippeswamy 'Puneet'
Editor Tippeswami
Publication Year 2006
Edition Year 2006, Ed. 1st
Pages 201p
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 1
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Author: Kuvenpu

कुवेंपु

मूल नाम : कुपल्ली वेंकटप्पागौड़ा पुटप्पा 

जन्‍म : 29 दिसम्बर, 1904

एक कन्नड़ लेखक एवं कवि थे, जिन्हें 20वीं शताब्दी के महानतम कन्नड़ कवि की उपाधि दी जाती है। ये कन्नड़ भाषा में ‘ज्ञानपीठ पुरस्‍कार’ पानेवाले आठ व्यक्तियों में प्रथम थे। पुटप्पा ने सभी साहित्यिक कार्य उपनाम ‘कुवेंपु’ से किए हैं। उनको साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में सन् 1958 में ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया गया था। उनके द्वारा रचित एक महाकाव्य ‘श्रीरामायण दर्शनम्’ के लिए उन्हें सन् 1955 में ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।

निधन : 11 नवम्‍बर, 1994

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