Nadi Usi Tarah Sunder Thi Jaise Koi Bagh

Poetry
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Nadi Usi Tarah Sunder Thi Jaise Koi Bagh
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मैंने संजय अलंग के कविता-संग्रह ‘नदी उसी तरह सुन्दर थी जैसे कोई बाघ’ को एक पाठक की तरह देखा। कई कविताओं के कथ्य और शिल्प ने मुझे रोककर उसे दुबारा पढ़ने को बाध्य किया।

इस संग्रह की 'सुन्दर' शीर्षक कविता में, संजय सौन्दर्य की अवधारणा पर गोया एक विमर्श सृजन करते हैं। आलोचना या कथा में विमर्श सहज सम्भव होता है किन्तु कवि ने इसे कविता के माध्यम से करने की कोशिश की है। इसे देखिए—‘गुलाब उसी तरह सुन्दर था जैसे कोई नदी/नदी उसी तरह सुन्दर थी जैसे कोई बाघ/ बाघ उसी तरह सुन्दर था जैसे कोई मैना/...स्वाद और सुन्दरता/ सभी जगह थी/ बस उसे देखा जाना था/ख़ुशी के साथ।’

बकौल मुक्तिबोध संवेदना जो ज्ञानात्मक होती है। संजय की कविताएँ कुछ चकित करने के साथ ही चीज़ों को रूढ़ अवधारणाओं से मुक्त होकर देखने और पढ़ने की माँग करती हैं। कविताओं में महीन विमर्श निहित है जो दार्शनिक स्तर के बावजूद अमूर्त नहीं यथार्थवादी है और सोचने को बाध्य करता है। कविताओं के कथ्य में आप अपने को पाते हैं और विमर्श में सम्मिलित हो जाते हैं। उनका शिल्प आपको अपने साथ बनाए रखता है।

संग्रह की ही कविता ‘बँटे रंग' उस राजनीति की याद दिलाती है, जो न सिर्फ़ तामसी, राजसी और सात्त्विक, बल्कि स्त्रियों के रंगों को पुरुषों के रंगों से अलग बताती है। यह धूर्तता और संकीर्णता को उजागर करनेवाली अभिव्यक्ति और उत्कृष्ट कविता है। संजय अलंग की रचना-प्रक्रिया में संगतियों और विसंगतियों की यह खोज निरन्तर चलती रहती है और उनके कथ्य को विचारणीय बनाती है।

कड़ी मेहनत से सब कुछ पा लेने का भ्रम फैलाकर मज़दूरों का शोषण, उपासना-स्थलों के फ़र्श पर गिरे हुए प्रसाद की चिपचिपाहट से उपजी वितृष्णा और मंडी या सट्टा बाज़ार में धन्धेबाज़ों की तरह ग्राहकों को पुकारते पुजारी कैसे मनुष्यता और आस्था के मूल्यों को घृणित और पतनशील बना देते हैं; संजय अलंग की कविताएँ उसकी अनेक झलकियाँ प्रस्तुत करती हैं। यह उजागर होता है कि, आराध्य पीछे छूट जाता है और छूटता चला जाता है।

कविताओं में प्रतीक और बिम्ब मौलिक और मुखर होकर उभरे हैं। बूँदाबाँदी के दिन, एक छाते में साथ-साथ सिहरते हुए क्षणों का एक सुन्दर और मौलिक बिम्ब है। 'शाह अमर हो गया लाल क़िले के साथ' कविता प्रतीकों को नया विस्तार देती है।

कविताएँ विषय वैविध्य से भरपूर हैं। कवि की दृष्टि तीक्ष्ण है। वह रोज़मर्रा की गतिविधियों को भी खोजपूर्ण दृष्टि से देखता है। यह दृष्टि विश्लेषणपरक है जो अदृश्य को देखने की उत्सुकता से भरी है। ‘क्रमांक वाला विश्व’ कविता-दृष्टि तीक्ष्णता की ओर ध्यान आकृष्ट करती है।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2020
Edition Year 2020, Ed. 1st
Pages 128p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1.5
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Sanjay Alung

Author: Sanjay Alung

संजय अलंग

जन्म : 08 जुलाई, 1964; भिलाई, छत्तीसगढ़।

शिक्षा : एम.ए., पीएच.डी., बैकुंठपुर (कोरिया), अम्बिकापुर (सरगुजा) और दिल्ली में।

मातृभाषा : पंजाबी।

प्रकाशित पुस्तकें : ‘शव’, ‘पगडंडी छिप गई थी’ (कविता-संग्रह); ‘छत्तीसगढ़ : इतिहास और संस्कृति’ (पुरस्कृत),  ‘छत्तीसगढ़ की जनजातियाँ और जातियाँ’, ‘छत्तीसगढ़ की पूर्व रियासतें और ज़मींदारियाँ’, ‘छत्तीसगढ़ : भूगोल और संसाधन’, ‘छत्तीसगढ़ का सांस्कृतिक वैभव’ (दस से अधिक शोधात्मक पुस्तकें); ‘छत्तीसगढ़ के त्योहार और उत्सव’, ‘छत्तीसगढ़ के हस्तशिल्प’ (चित्रकार डॉ. सुमिता अलंग  के साथ सहलेखन); कविता-संकलन ‘कविता छत्तीसगढ़’, ‘परस्पर कविता’ में कविताएँ और ‘प्रगतिशील वसुधा’ के हिन्दी सिनेमा अंक में लेख सम्मिलित।

सम्पादन : आईएएस ऑफ़िसर्स एसोसिएशन, छत्तीसगढ़ के पत्र ‘व्यूज़ एंड न्यूज़’ के सम्पादक-मंडल में।

सम्मान : केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा पुरस्कृत, ‘राष्ट्रकवि दिनकर सम्मान’, ‘श्रीकान्त वर्मा स्मृति साहित्य अवार्ड’, ‘सेवा शिखर सम्मान’, ‘इंडिया आइकन अवार्ड’, ‘राजीव गाँधी एक्सीलेंस अवार्ड इन लिटरेचर’, ‘आगर हिन्दी साहित्य सम्मान’, इतिहास और संस्कृति लेखन पर ‘विषय विशेषज्ञ सम्मान’ आदि।

यात्रा : पूर्व, पश्चिम और दक्षिण एशिया तथा अफ्रीका आदि के कुछ देशों की यात्राएँ।

सम्प्रति : भारतीय प्रशासनिक सेवा में कार्यरत और संभागीय आयुक्त, बिलासपुर और सरगुजा संभाग, छत्तीसगढ़ में पदस्थ।

ईमेल : sanjay.alung@gov.in, s.alung@gmail.com

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