Kaise Banain balak Sanskari Aur Swasth

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Kaise Banain balak Sanskari Aur Swasth
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जिज्ञासा मानव-विकास की आदि एवं मूलभूत आवश्यकता है। उसकी रक्षा से ही हम समाज को विकसित, सम्पन्न एवं उन्नत बना सकते हैं। पर प्रायः देखा जाता है कि व्यस्त माता-पिता बच्चों के प्रश्नों से खीज जाते हैं और उनको सदैव अपने काम में बाधा उपस्थित करनेवाले प्राणी समझते हैं। उनको उद्दंड और मूर्ख ठहराकर उन्हें चुप करा देते हैं और उनकी जिज्ञासा प्रवृत्ति को कुचल देते हैं। ऐसे बालक ख़ुद को उपेक्षित, अनभीष्ट और प्रेमवंचित महसूस करते हैं। इसका परिणाम बहुत ही भयावह होता है। बालक संसार में सुरक्षा और स्थिरता चाहता है। बालक के भावनात्मक विकास के लिए पिता के अधिकार, माँ के ममत्व और भाई-बहन की उदारता एवं सौहार्द की बहुत आवश्यकता है। ऐसा न होने पर उसके मन में भाँति-भाँति की ग्रन्थियाँ पड़ जाती हैं, जो भविष्य में उसके सारे व्यवहारों को प्रभावित करती हैं। कई बार देखा गया है कि पिता के बढ़ते वर्चस्व को देखकर माँ में असुरक्षा की भावना घर करने लगती है। अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए वह अपनी ही बात मनवाना चाहती है, पिता के बीच में बोलने पर रोक देती है, ऐसी स्थिति में बच्चे उद् दंड और बदतमीज़ हो जाते हैं। पिता को अहमियत नहीं देते। इसके विपरीत माँ के डाँटने-मारने के समय यदि पिता बच्चों का पक्ष लेता है तब भी बच्चे बिगड़ जाते हैं और माँ का सम्मान नहीं करते। वास्तव में होना यह चाहिए कि यदि माँ किसी ग़लत बात पर डाँट रही है, तो पिता को चाहिए कि बीच में न बोले और पिता कुछ कह रहा है, तो माँ उस समय चुप रहे।

More Information
Language Hindi
Format Paper Back
Publication Year 2010
Edition Year 2010, Ed. 1st
Pages 200p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 1
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Editorial Review

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Author: Prem Bhargav

प्रेम भार्गव

उत्तर प्रदेश के चन्‍दौसी ज़िले के एक मध्यवर्गीय परिवार में 2 जुलाई, 1936 को जन्मी डॉ. प्रेम भार्गव के पिता श्री कान्तिचन्द्र भार्गव विद्युत विभाग में अभियन्ता थे। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा माँ की देखरेख में हुई। माँ श्रीमती कमला बहुत पढ़ी-लिखी नहीं थीं, पर बड़ी विवेकशील और सरल स्वभाव की महिला थीं। अत: अच्छे संस्कारों के साथ विद्याध्ययन के प्रति रुचि, सत्साहित्य के प्रति प्रेम का बीज भी उन्होंने अपने बच्चों में बोया। यही कारण है कि स्कूल और शिक्षक के अभाव में अपनी लगन के बल पर डॉ. प्रेम ने घर पर ही अध्ययन करके प्रवेशिका, विद्याविनोदिनी, विदुषी और इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर बी.ए. ऑनर्स (हिन्दी) दिल्ली विश्वविद्यालय से किया।

विवाहोपरान्त पति एवं परिजन ने उन्हें आगे अध्ययन जारी रखने में प्रोत्साहित किया और वे एम.ए. (हिन्दी) परीक्षा पूर्ण कर मुम्बई आ गईं। इसके बाद उन्होंने अपने एकमात्र पुत्र पंकज का पालन-पोषण करते हुए भी अपने पतिदेव की सत्प्रेरणा से हिन्दी साहित्य में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त कर ली।

विश्वविद्यालयी जीवन में डॉ. प्रेम ने अनेक निबन्ध-प्रतियोगिताओं में पुरस्कार जीते, पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख निरन्तर छपते रहे हैं, भाषा एवं साहित्य सम्बन्धी उनके कुछ लेख संग्रहणीय हैं। उनकी कई बाल कथाएँ चर्चित रही हैं। उनकी महत्त्वपूर्ण पुस्‍तक ‘परमाणु की आत्मकथा’ को रक्षा मंत्रालय के राजभाषा विभाग द्वारा द्वितीय पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया।

डॉ. भार्गव राष्ट्रीय अन्ध संस्था, मुम्बई के द्वारा दृष्टिहीनों के लिए हिन्दी ब्रेल लिपि में प्रकाशित विज्ञान पत्रिका ‘भारती’ की मानद सम्पादक रही हैं।

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