Dararon Mein Ugi Doob

Poetry
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Dararon Mein Ugi Doob
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छोटी और कुछ बहुत ही छोटी इन कविताओं का उत्स जीवन के हाशियों पर दूब की तरह उगते, पलते और झड़ जाते दु:खों के भीतर है—इसका अहसास आपको एक-एक कविता से गुज़रते हुए धीरे-धीरे होता है। धीरे-धीरे आप जानने लगते हैं कि किस कविता की किस पंक्ति में दरअसल कितनी बड़ी एक टीस को छिपाकर गूँथ दिया गया है।

'घर की उम्र के लिए/एक पूरा आदमी/टुकड़े-टुकड़े बँटकर/थामता है/हर कोना/...घर की उम्र के लिए/बिखर कर मर जाता है/एक पूरा आदमी।’ घर यहाँ दरअसल एक व्यवस्था का, एक स्थिर सुरक्षा का और सरल शब्दों में कहें तो उस दुनियादारी का प्रतीक है, जिसकी तरफ़ एक व्यक्ति जीवन-भर खिंचकर आता है तो उतने ही वेग से उससे दूर भी जाता है। भीतर और बाहर की इसी खींचतान के अलग-अलग बिन्दुओं से उपजी बेचैन मगर बहुत गहरे में हमें अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति का शान्त आधार उपलब्ध करानेवाली ये कविताएँ इसी अर्थ में विशिष्ट हैं कि ये हमें अपनी सादगी से अपने बहुत नज़दीक बुलाकर हमारा दु:ख सोखती हैं। भाव-बोध के आधार पर संग्रह की कविताओं को चार खंडों में समायोजित किया गया है। पहला है 'पगडंडी’ जिसमें ग्रामीण जीवन और परिवेश में बसे, बनते-बिगड़ते-बदलते रिश्तों और रूपाकारों को सहेजने-समेटने की संवेदन-यात्रा समाहित है। दूसरे खंड 'अलाव’ में अपने अस्तित्व के इर्द-गिर्द बुनी आँच और उसकी लपटों को पकडऩे, चित्रित करने की बारीक लेकिन सुदृढ़ बुनाई है। 'आरोह-अवरोह’ में घर, रिश्तों और कचहरी में फैले आहत तन्तुओं को गहरी-तीखी रंगत में उकेरा गया है। और, चौथे खंड 'मध्यान्तर के बाद’ में पुन: जीवन की जड़ों को खोलकर- खोदकर देखने की कोशिश की गई है जो हमारी सवंदेना-यात्रा को वापस जीवन में आरम्भ से जोड़ देती है।

'पत्थरों को संवेदना देती है/उनकी दरारों में दबी मिट्टी/जहाँ उग आती है दूब/चट्टानों के अस्तित्व को ललकारती।’ ये कविताएँ दरअसल जीवन की कठोर, पथरीली चट्टानों के बीच बची मिट्टी में उगी कविताएँ हैं; जिनमें हम अपने दग्ध वजूद को कुछ देर भीनी-भीनी ठंडक से भर सकते हैं।

 

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2020
Edition Year 2020, Ed. 1st
Pages 128p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 20.5 X 13.5 X 1.5
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Editorial Review

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Chitra Desai

Author: Chitra Desai

चित्रा देसाई

दिल्ली में पली-बढ़ीं, अब मुम्बई में।

शिक्षा : बी.ए. (राजनीतिशास्त्र), एल.एल.बी., दिल्ली विश्वविद्यालय। ऑल्टर्नेटिव डिस्प्यूट रिजोल्यूशन कोर्स, मुम्बई विश्वविद्यालय। 1980 से सर्वोच्च न्यायालय में वकालत।

‘राष्ट्रीय फ़‍िल्म पुरस्कार निर्णायक मंडल’ की पूर्व सदस्य। ‘केन्द्रीय फ़‍िल्म प्रमाणन बोर्ड’ की पूर्व सदस्य।

‘राष्ट्रीय फ़‍िल्म संग्रहालय’ की सलाहकार समि‍ति की पूर्व सदस्य। ‘बार्कलेज इंडिया’ की सलाहकार समिति की सदस्य। विदेश मंत्रालय में ‘हिन्दी सलाहकार समिति’ की सदस्य। काव्य-संग्रह 'सरसों से अमलतास’ को ‘गुफ़्तगू’, इलाहाबाद द्वारा 'सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान’। यही काव्य-संग्रह 'महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादेमी’ द्वारा भी सम्मानित। ‘कविकुम्भ’, देहरादून द्वारा 'स्वयंसिद्धा सम्मान—2018’ (साहित्य) से सम्मानित।

कविवर गोपाल सिंह नेपाली फ़ाउंडेशन द्वारा 'नेपाली गीत-सम्मान—2018’। राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी साहित्य उत्सव तथा सम्मेलनों में सक्रिय भागीदारी।

 

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