British Samrajyavad ke Sanskritik Paksha Aur 1857

History,आज़ादी का अमृत महोत्सव
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British Samrajyavad ke Sanskritik Paksha Aur 1857
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1857 के डेढ़ सौ से ज्‍़यादा वर्ष बीत जाने के बाद आज इतिहास के इस पड़ाव को सही सन्दर्भों में स्थापित किया जाना नितान्त आवश्यक है।

गम्भीरता से जाँचा-परखा जाए तो यह पड़ाव मात्र एक रोमांचकारी अनुभूति देनेवाला न होकर हिन्दुस्तान के इतिहास की तमाम ऐसी प्रवृत्तियों का संवर्द्धन करनेवाला और उनका उद्गम स्रोत भी दिखाई देता है जिनका नाता उस उत्तर-औपनिवेशिकता से भी बनता दिखता है जिसकी कल्पना बीसवीं शताब्दी के मध्य में आकर ही विश्व के विचारकों द्वारा की जा सकी।

सांस्कृतिक साम्राज्यवाद यदि उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही पश्चिमी विश्व की एक सुविचारित विचारधारा का स्वरूप ग्रहण कर चुका था तो उपनिवेशवाद के प्रारम्भिक स्वरूप का गवाह रहा हिन्दुस्तान, और वहाँ सांस्कृतिक दिशा में प्रवृत्त साम्राज्यवादी नीतियों की प्रतिक्रियाएँ भी उसी स्तर के प्रतिरोध पैदा करने में पूर्ण सक्षम थीं।

भारत में आनेवाले आधुनिक प्रभाव यहाँ की ज़मीन के लिए सहज तो थे ही नहीं, बल्कि कई अर्थों में बिलकुल भिन्न भी थे। फिर ये विचार पश्चिमी आधुनिकता का डंका पीटनेवालों और हर अन्य सभ्यता व संस्कृति को हेय दृष्टि से देखनेवाले पश्चिम के ईसाई विश्व द्वारा लाए जा रहे थे। किन्तु इन सबके साथ सबसे महत्त्वपूर्ण यह था कि ये उन औपनिवेशिक हुक्मरानों द्वारा लाए जा रहे थे जो इसे ज़बर्दस्ती लागू करने की मंशा और क्षमता दोनों ही रखते थे। यह परिदृश्य भारत में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को एक तरफ़ अन्तर्द्वन्द्वों में जकड़ता गया, साथ-साथ उसके इन दंभी हुक्मरानों को अनायास एक अदृश्य, अप्रत्याशित संकट की ओर भी खींचता चला गया।

गहराइयों तक पहुँचकर ही हम वे सारी सम्भावनाएँ तलाश सकते हैं जिन्होंने 1857 के इस पड़ाव को निर्मित किया। एक ऐसा पड़ाव जो युद्ध के रूप में सामने आया, और जिसका नायक एक सिपाही बना। वह सिपाही जो हिन्दुस्तान के आम आदमी, किसान और उच्च जाति, सबका प्रतिनिधि था और अंग्रेज़ सरकार के कार्यकलापों का साक्षी भी। इस सिपाही के द्वारा किए गए विद्रोह के अर्थ निश्चित रूप से गम्भीर थे।

अपने तमाम ऐतिहासिक पड़ावों से गुज़रती एक ज़रूरी और महत्‍त्‍वपूर्ण पुस्‍तक है ‘ब्रिटिश साम्राज्‍यवाद के सांस्‍कृतिक पक्ष और 1857’।

 

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2009
Edition Year 2009, Ed. 1st
Pages 224p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1.5
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Vandita Verma

Author: Vandita Verma

वन्दिता वर्मा

जन्म : 10 जनवरी, 1953

शिक्षा : 1984 में डी.फ़िल्. की उपाधि तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा। फिर यहीं आधुनिक इतिहास विभाग में अध्यापक। अब सेवानिवृत्त।

प्रमुख कृतियाँ : ‘ब्रिटिश साम्राज्‍यवाद के सांस्‍कृतिक पक्ष और 1857’, ‘फ़्रॉम मार्क्सिज़्म टु डेमोक्रेटिक सोशलिज़्म’ (अंग्रेज़ी में)।

ई-मेल : anupam5ald@dataone.in

 

 

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