Bhavishya Sangeet

Poetry
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Bhavishya Sangeet
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‘फरटाइडि‍गुं डेअर वोल्फ़े’ (भेड़िए की वकालत)—इस शीर्षक के कविता-संग्रह के साथ बीसवीं सदी के पचास के दशक में एक नौजवान जर्मन कवि‍ सामने आया—हंस माग्नुस एंत्सेनस्बेर्गर। उनकी मणिभीय भाषा, तीखे व्यंग्य व विद्रोही तेवर से स्पष्ट हो गया था कि यहाँ द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर जर्मन समाज के विरोधाभासों को गहराई से पहचाननेवाली कविता उभर रही है। इसी दशक के द्वितीयार्द्ध में जब उनका काव्य-संग्रह ‘लांडेष्प्राखे’ (देश की भाषा) प्रकाशित हुआ था, तो प्रसिद्ध आलोचक अल्फ़्रेड आन्दर्ष ने उनकी तुलना साहित्य-जगत में हाइनरिष हाइने के पदार्पण से की थी। बाद के वर्षों में अपने हर संग्रह के साथ एंत्सेनस्बेर्गर निखरते गए। सन् 1968 के छात्र-विद्रोह के बौद्धिक प्रवक्ता के रूप में उन्हें स्वीकृति मिली। कविता के क्षेत्र में अनेक नए प्रयोग देखने को मिले।

लेकिन प्रतिबद्ध कवि? ब्रेष्ट की परम्परा? जैसाकि कुछ आलोचकों का दावा था? एंत्सेनस्बेर्गर का आक्रामक विद्रोही स्वर परिणत पूँजीवाद की विसंगतियों पर प्रहार तो करता है, लेकिन क्या उनमें एक विकल्प की आशा है? दूसरी ओर—हालाँकि बाद की कविताओं में प्रकट निराशावाद से उनके प्रारम्भिक वामपन्थी भक्त अक्सर निराश हुए, लेकिन उन्हें भी मानना पड़ा कि उभरते हुए उत्तर-आधुनिक सूचना-समाज की जटिलताओं को शायद ही कोई दूसरा कवि इतने स्पष्ट रूप में प्रस्तुत कर सका है।

एंत्सेनस्बेर्गर के लगभग हर संग्रह से कुछ-न-कुछ कविताएँ चुनकर इस संकलन में उनके कवि-व्यक्तित्व को पहचानने की कोशिश की गई है। उन्होंने एक बार कहा था कि वे कविता न पढ़नेवालों के लिए कविताएँ लिखते हैं। आशा है कि हिन्दी में भी कविता न पढ़नेवाले पाठक होंगे।

 

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 1999
Edition Year 1999, Ed. 1st
Pages 79p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 1
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Editorial Review

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Author: Ham Magnus Enzensberger

हंस माग्नुस एंत्सेनस्बेर्गर

जन्म : 11 नवम्‍बर, 1929; आलगोय। 

एरलांगेन, फ़्राईबुर्ग, हैम्बर्ग और सोरबोन में साहित्य व दर्शनशास्त्र का अध्ययन; स्‍टुटगार्ट में रेडियो के सम्‍पादक के रूप में काम। वर्षों तक अमरीका, मेक्सिको, नार्वे, इटली व क्यूबा का प्रवास; प्रसिद्ध जर्मन साहित्य आन्‍दोलन ‘ग्रुप 47’ के संस्थापक सदस्य; ‘कुर्सबुख’ व ‘ट्रांसअटलांटिक’ पत्रिकाओं के संस्थापक-सम्‍पादक; ‘अन्य पुस्तकालय’ नामक साहित्य-पुस्तक-शृंखला के प्रकाशक।

जर्मन आलोचक संघ के ‘साहित्य पुरस्कार’, ‘गेओर्ग ब्युषनर पुरस्कार’, रोम का ‘पासोलिनी पुरस्कार’, ‘हाइनरिष ब्योल पुरस्कार’, बवेरियाई ललित कला अकादमी का ‘साहित्य पुरस्कार’, ‘हाइनरिष हाइने पुरस्कार’, ‘प्रिंस ऑफ़ ऑस्टुरियस कम्युनिकेशंस एंड ह्यूमैनिटीज़ पुरस्‍कार’, ‘ग्रिफ़ि‍न पोएट्री पुरस्‍कार’ व ‘पोएट्री एंड पीपुल इंटरनेशनल पोएट्री पुरस्‍कार’ सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित। जर्मनी के सबसे महत्त्वपूर्ण कवियों में से एक।

प्रमुख काव्य-संग्रह : ‘फ़रटाइडिगुं डेअर वोल्फ़े’ (भेड़ियों की वकालत); ‘लांडेस्‍ष्‍प्राखे’ (देश की भाषा); ‘ब्लिंडनश्रि‍फ़्ट’ (अंधों की लिपि); ‘डी ग्रोसे वांडरूंग’—‘द्राइउंटद्राइशिष मार्कियरुंगेन’ (समाधि, प्रगति के इतिहास की सैंतीस गाथाएँ); ‘डेअर उंटरगांग डेअर टिटानिक’ (लुप्ति का आक्रोश); ‘त्सुकुंफ़्टस्मुज़ीक’ (भविष्य संगीत); ‘किओस्क’ (गुमटी) आदि।

वर्तमान निवास म्युनिख, जर्मनी में। 

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