Aupniveshik Shasan : Unneesveen Shatabdi Aur Stree Prashn

History,Women Studies
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Aupniveshik Shasan : Unneesveen Shatabdi Aur Stree Prashn

पिछली और वर्तमान सदी की आधुनिक स्त्री की समस्याएँ जब बार-बार परम्परा और संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में ही समाधान खोजती हैं तो सुदूर मानव इतिहास में न सही निकट के इतिहास में जाकर खोजबीन आवश्यक हो जाती है। उन्नीसवीं सदी नवजागरण की सदी है और आधुनिकता इसी नवजागरण का प्रतिफलन है। चूँकि ’आधुनिक स्त्री’ के जन्म का श्रेय भी इसी शती को दिया जाता है तो इक्सीसवीं सदी में आधुनिक स्त्री की समस्या का समाधान खोजने इसी शताब्दी के पास जाना होगा। यह पुस्तक इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में भी आधुनिक स्त्रियों के सामने मुँह बाए खड़े प्रश्नों की जड़ तक पहुँचने की वह दृष्टि है जिसे विभिन्न घटकों से गुज़रते हुए व्याख्यायित करने की कोशिश की गई है।

पहले अध्याय में जहाँ 'भारतेन्दु युग : उन्नीसवीं शताब्दी और औपनिवेशिक परिस्थितियाँ’ में उन्नीसवीं सदी की औपनिवेशिक परिस्थितियों और हिन्दी नवजागरण के अन्तर्सम्बन्धों का विश्लेषण किया गया है, वहीं द्वितीय अध्याय ‘औपनिवेशिक आर्थिक शोषण, हिन्दी नवजागरण और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र' में औपनिवेशिक शासन-काल में हिन्दी नवजागरण के बीज और उसके पल्लवन के परिवेश की प्रस्तुति का प्रयास है। तृतीय अध्याय में ‘धर्म, खंडित आधुनिकता एवं स्त्री' में केवल हिन्दी या भारतीय नहीं बल्कि पूरे विश्व की स्त्रियों के प्रति धर्म की विद्वेषपूर्ण भावना का एक विहंगम अवलोकन है। चतुर्थ अध्याय 'स्त्री और उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध का हिन्दी साहित्य’ में पैंतीस वर्षों के सामाजिक प्रश्नों में समाविष्ट स्त्री-प्रश्नों को सम्‍बोधित करने की जुगत है। ये पैंतीस वर्ष वस्तुत: भारतेन्दु के जीवन-वर्ष हैं। वहीं पंचम अध्याय ‘उन्नीसवीं सदी के अन्तिम डेढ़ दशक और स्त्री-प्रश्न' में उन्नीसवीं सदी के अन्तिम डेढ़ दशकों में सम्‍बोधित स्त्री-प्रश्नों को ‘मूल’ के साथ चिन्हित किया गया है।

कह सकते हैं कि पुस्तक में उन्नीसवीं शताब्दी के औपनिवेशिक शासन-काल में स्त्री-परिप्रेक्ष्य में धारणाओं-रूढ़‍ियों, भावनाओँ-पूर्वग्रहों, आग्रहों-दुराग्रहों, अनमेल विवाह, वर-कन्या विक्रय, स्त्री-दासता, स्त्री-अशिक्षा, स्त्री-परित्याग, छुआछूत आदि से टकराते तर्क और विश्लेषण की जो ज़मीन तैयार की गई है, वह अपने चिन्तन मेँ महत्त्वपूर्ण तो है ही, विरल भी है।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2019
Edition Year 2019, 1st Ed.
Pages 400p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 3.5
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Editorial Review

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Rupa Gupta

Author: Rupa Gupta

रूपा गुप्ता

रूपा गुप्ता ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से पी-एच.डी. और वर्द्धमान विश्वविद्यालय से डी.लिट. की उपाधियाँ अर्जित की हैं। भारतीय नवजागरण उनकी विशेषज्ञता का क्षेत्र रहा है। पिछले तीन दशकों में उन्होंने हिन्दी-नवजागरण के गहन अध्ययन के साथ बंगला- नवजागरण पर नए दृष्टिकोण से विचार किया है।

उनकी प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें हैं—‘साहित्य और विचारधारा’, ‘भारतेन्दु एवं बंकिमचन्द्र’, ‘हिन्दी और बंगला नवजागरण’, ‘औपनिवेशिक शासन : उन्नीसवीं शताब्दी और स्त्री-प्रश्न’, ‘खुदीराम बोस’, ‘अज्ञेय और प्रकृतिएवं उन्नीसवीं सदी का औपनिवेशिक भारत : नवजागरण और जाति-प्रश्न’, ‘बंकिमचन्द्र के हिन्दी में अप्रकाशित निबन्धऔर बंकिमचन्द्र के निबन्ध। उन्होंने राधामोहन गोकुल की अप्राप्य रचनाएँ’, ‘सुभद्रा कुमारी चौहान ग्रंथावलीऔर नज़ीर अकबराबादी रचनावलीका संकलन व सम्पादन भी किया है।

ग़ुलाम’, ‘गौरव पाया फिर से’, ‘कलकत्ता बन्दरगाह का संक्षिप्त इतिहासके अनुवाद और सम्पादन में उन्होंने दासों, कुष्ठ रोगियों और श्रमिकों के निर्माण, निर्वासन और निरीहता की पीड़ा को प्रस्तुत किया है।

महत्त्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित।

फिलहाल वर्द्धमान विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल में हिन्दी की प्रोफ़ेसर हैं।

सम्पर्क : rupagupt25@gmail.com

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