Armeniayi Jan Sanhar : Ottoman Samrajya Ka Kalank

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Armeniayi Jan Sanhar : Ottoman Samrajya Ka Kalank

2015 में आर्मेनियाई जनसंहार को सौ वर्ष हो गए, हममें से कितनों को इसके बारे में पता है? जबकि सच्चाई यह है कि आर्मेनियाई जनसंहार निर्विवाद रूप से बीसवीं सदी का पहला जनसंहार था ! सच तो यह भी है कि भारत में बहुत से लोग आर्मेनिया नामक देश से भी परिचित नहीं हैं। किन्तु उन्नीसवीं सदी के अन्तिम दशक से लेकर बीसवीं सदी के तीसरे दशक तक निरन्तर सुनियोजित तरीक़े से ऑटोमन साम्राज्य द्वारा आर्मेनियाई मूल के लोगों के संहार को जानना आज इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि आज भी राज्यसत्ताएँ अपनी शक्ति बरकरार रखने के लिए जिन उपायों का प्रयोग करती हैं, उनमें से प्रमुख है अपने देश के किसी भी प्रकार के अल्पसंख्यकों को सारी परेशानियों की जड़ बताकर उनको प्रताड़ित करना। प्रथम विश्वयुद्ध के पहले ऑटोमन साम्राज्य में लगभग 20 लाख आर्मेनियाई रहते थे और उनमें से क़रीब 15 लाख आर्मेनियाई सन् 1915-1923 के बीच मार डाले गए और शेष का बलात् धर्मान्तरण या विस्‍थापन कर दिया गया। तुर्की ने आज तक इस जनसंहार को स्वीकार नहीं किया है। दरअसल ज़रूरत इस बात की है कि इस जनसंहार की घटना को व्यापक रूप से स्वीकार किया जाए, ताकि आनेवाली पीढ़ियाँ सुलह के रास्ते ढूँढ़ सकें और विश्व-भर के लोग जनसंहार की पनप रहीं स्थितियों के प्रति सचेत हो जाएँ। इस पुस्तक का उद्देश्य यही है।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2021
Edition Year 2021, Ed. 1st
Pages 352p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 3
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Editorial Review

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Suman Keshari

Author: Suman Keshari

सुमन केशरी

सुमन केशरी का जन्म मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार में हुआ। वे मूलतः कवि हैं किन्तु उन्होंने लेख, कहानी, नाटक, यात्रा-वृत्तान्त जैसी विधाओं में भी पर्याप्त काम किया है। कविताओं की व्याख्याओं के साथ-साथ आर्मेनियाई जनसंहार पर एक पुस्तक तैयार की है। उन्हें प्रशासन, अध्यापन और सामाजिक क्षेत्र में काम करने के गहरे अनुभव हैं। मिथकीय चरित्रों की मूल संवेदना को बनाए-बचाए रखते हुए, मिथकों को आज के लिए प्रासंगिक बनाने की कला में वे निष्णात हैं। उन्होंने रामायण और महाभारत के अनेक चरित्रों और प्रसंगों पर कविताएँ व लेख लिखे हैं।

सुमन जी की प्रकाशित कृतियाँ हैं—‘याज्ञवल्क्य से बहस’ (2008), ‘मोनालिसा की आँखें’ (2013), ‘शब्द और सपने’ (2015), ‘पिरामिडों की तहों में’ (2018), ‘निमित्त नहीं!!’ (2022) (कविता-संग्रह); ‘गांधारी’ (नाटक); ‘कोराना काल में शादी’ (लघु नाटक)। ‘जेएनयू में नामवर सिंह’ (2009), ‘आर्मेनियाई जनसंहार : ऑटोमन साम्राज्य का कलंक’ (2021, सुश्री माने मकर्तच्यान के साथ सम्पादन)।

‘मोनालिसा की आँखें’ संकलन का मराठी और राजस्थानी में अनुवाद प्रकाशित है।

जीवन और लेखन दोनों में प्रयोगधर्मी सुमन केशरी इन दिनों ‘कथानटी सुमन केशरी’ के नाम से सोशल मीडिया पर कहानियाँ भी सुनाती हैं।

सम्पर्क : sumankeshari@gmail.com

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